दहलीज पर हूं
लगा दुनिया छूटी
बारिश हो रही है
पीछे है महकती मिट्टी
रूठा है हर कोई
गाँव, खाट और खेत
टकटकी लगाए हुए
गाय, बकरी और भैंस
हिम्मत की मैंने
कदम पहला रखने की
ठिठुर गया शरीर
मानो शामत आयी हो प्राण की
दोपहर की भंवराहट
शान्त होने को है
शक उसे भी हुआ है
मेरी इस करतूत पर
बड़े औहदे की आंस में
स्वार्थ की तलाश में
बहुत से अपनों का
मुजरिम बन बैठा हूं मैं
दहलीज पर हूं
लगा दुनिया छूटी
बारिश हो रही है
पीछे है महकती मिट्टी
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