मैने एक मुद्दत बाद फिर वही ख्वाब देखा है ।
सुखी नदियों में फिर पानी का एक सैलाब है ।
गुलशन को उजाड़ जो इमारत तुम ने बनाई है ।
उसी की छत पर फिर खिला गुलाब देखा है ।
मैने एक मुद्दत बाद फिर वही ख्वाब देखा है ।
इस उम्र में भी फिर वही पुराना रूबाब देखा है ।
बुढ़ापे में कमजोर समझ कर अकेला छोड़ा है ।
बादशाहो को उनके दर पर करते आदाब देखा है ।
मैंने एक मुद्दत बाद फिर वही ख्वाब देखा है ।
फटी जिल्द में भी एक अच्छा किताब देखा है ।
स्वर्ग नर्क जन्नत दोजख की क्या बाते करते है ।
हम ने इंसान का जमीन पर होते हिसाब देखा है ।
-अब्बास राजस्थानी