सुनके समझे तो वो क्या समझे।
अजीज देखती नजरो को समझे।
हम दोनो साथी बचपन के नही।
मगर आँसुओ के फर्क को समझे।
रिश्तो से अच्छे बत्तीसी के दाँत।
बिना कुछ कहे जीभ को समझे।
घायल न हो जाये दाँतो के बीच।
रक्षा करने के 'उपदेश' को समझे।
उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।