क्या उसके दिल में दर्द है, सारे जहान का।
जो हालात बयाँ कर रहा, हिन्दुस्तान का।।
औरों देशो की परेशानी, कर रही परेशान।
जैसे जुम्मेदारी ले रखी, उनकी जुबान का।।
गरीब का दर्द, बखूबी जानता पहचानता।
बेचा है उसने बहुत कुछ, अपने मकान का।।
ये हारे हुए इंसान, जरा लडके देख तो सही।
शुरुआत कुछ यूँ हो, आहत न हो गुमान का।।
सत्ता ने गरीब को, मजबूर बना कर छोड़ा।
किसान बना 'उपदेश', बेजुबाँ की जुबाँ का।।
उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद
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