बारिश का कहर, बाढ़ बनके छाया।
किनारे तोड़कर, मेरी गली में आया।।
अन्धे बादलो को, हवाएँ लेकर घूमें।
ऐसे में हुस्न-परी का, ख्याल आया।।
ठिठुरते पानी में, सांसें धुआँ-धुआँ।
दिख रही, खिड़की से इशारा आया।।
एकदम चल दिये, उठाई नही छतरी।
छपक-छपक कर, उसका घर आया।।
सुक्रिया खुदा का, अंधेरा कर दिया।
'उपदेश' खुश हुए, दिल ने दिल पाया।।
उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद
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