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होश कहाँ

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरी सांस धीमी हुई, अफसोस कहाँ।
        
                                                    
                            
जब देखने आये लोग, तो होश कहाँ।
घर में रहने वाले, घबरा गये देखकर।
अस्पताल लेकर चल दिये, होश कहाँ।
वो आई देखने, दरवाजे पर गिर गई।
भगवान के घर देर है, अंधेर शेष कहाँ।
अब कौन क्या सोचता, सफर खत्म।
मेरा भी जलवा, 'उपदेश' शेष कहाँ।

उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद
2 वर्ष पहले
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