पल न बीता, फिर भी सांस न घबराई।
बैठे-बैठे ही सो लेती, आती न अँगडाई।
घर में काम बहुत पडा, करने को बाकी।
कब से होठों पर, लिपस्टिक नही लगाई।
कभी लगे, तुम अभी-अभी आ जाओगे।
ये मुझको पता नही, कब होगी सुनवाई।
यादो की माया नगरी, और भूले 'उपदेश'।
हिचकी शायद भूल गई, तुमको न आई।
उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद