रात सपने में, वो मिलने आ गये।
गले लग करके, दिल पर छा गये।।
होंठ पर होंठ रखा, कुछ इस तरह।
पूरे तन में फुर्फुरी, बढाने आ गये।।
कब से भटक रही थी, रेगिस्तान में।
प्यास बुझाने, लार बनकर आ गये।।
कट रहा था वक्त, धूप में जल कर।
होले से, घने बादल बनकर आ गये।।
एक तस्वीर बनाई थी, हमसफर की।
'उपदेश' हुबहू, दीदार करने आ गये।।
उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद
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