इन ठंडी पड़ती रातों में तुम कम्बल बन के आ जाना
इस ठंडे शिथिल मनोबल को सांसों से अपनी महकाना
जाएं सांसें जब घुल मुझ में, क्या कमाल ना हो जाए
नज़रें जब मिलें निगाहों से, क्या क्या बवाल ना हो जाए
कांपे किसलय की भांति अधर, दृग हो कमान की तरह सुगढ़
इन अधरो का स्पर्श, विकल कर दे मन कितना भी हो दृढ़
चपला की भांति दंत श्रखल या श्वेतांबर धारित श्रमण
ज्यों तीव्र मंद मुस्काहट वो कर देती मन को यथा कृपण
क्या जानूं शांति का स्तर जब हो अशांति मेरे अंदर
नैनों में झांयी आते ही थिर हो जाते सब सामुंदर
बतलाती ऐसे चपल धवल, कर सकल विकल ओ कुछ निर्बल
समयातुर हो संपन्न सकल तब मिलता तुमसे ही संबल
ज्यों ज्यों सोचूं आओगी जब, क्या बोलूं या रहूं मौन शिखर
तुम बस समेट लेना मुझको जब भी में लगने लगूं बिखर
पर इन सबके होने पर भी मेरे ऐसे खोने पर भी
तुम आ जाना बस ऐसे ही सबकुछ शाश्वत होने पर भी
सोते से मुझे जगा जाना वर्षा अपनी से भिगो जाना
पर आ जाना तुम आ जाना तुम आ जाना बस आ जाना
-उपदेश कुमार