तुम क्या थे, और क्या बन गये।
प्यार से कह दूँ, बेईमान बन गये।
कभी सोचा न था, ये दौर आयेगा।
हद गुजरेगी, और सैलाब बन गये।
आ गये करीब, प्यास बुझाने को।
उस वक्त से, मेरे मेहमान बन गये।
खुद को, आइना में देखती रह गई।
बिंदिया के रंग में, सम्मान बन गये।
अहिस्ता-अहिस्ता, सहारा बनकर।
अरमान पूरे करके, जान बन गये।
फूल खिलाकर, दामन में 'उपदेश'।
पूरी बगिया के, भगवान बन गये।
उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद
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