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तुम क्या थे

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम क्या थे, और क्या बन गये।
        
                                                    
                            
प्यार से कह दूँ, बेईमान बन गये।
कभी सोचा न था, ये दौर आयेगा।
हद गुजरेगी, और सैलाब बन गये।
आ गये करीब, प्यास बुझाने को।
उस वक्त से, मेरे मेहमान बन गये।
खुद को, आइना में देखती रह गई।
बिंदिया के रंग में, सम्मान बन गये।
अहिस्ता-अहिस्ता, सहारा बनकर।
अरमान पूरे करके, जान बन गये।
फूल खिलाकर, दामन में 'उपदेश'।
पूरी बगिया के, भगवान बन गये।

उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद

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4 वर्ष पहले
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