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यौवन आया

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपने से ही डरने लगी हूँ, आजकल।
        
                                                    
                            
लज्जया से गडने लगी हूँ, आजकल।

बदलती संरचना, सवाल खडे कर रही।
उत्तर की तलाश में गुमसुम, आजकल।

कब शातिर कह दिया जायेगा, 'उपदेश'।
सिर झुका के चलने लगी हूँ, आजकल।

उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद
3 वर्ष पहले
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