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ख़्वाब

Vashist Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ख्वाबों को ऐनक की तरह नज़रो पे चढ़ाये रखा,
        
                                                    
                            
हर शा में अपने ही ख्वाबों को निहारता रहा,
मंज़िल को पाने की आरज़ू आंखों में लिए,
कुछ यूं अकड़ के चला की,
समाज की एक ठोकर से ,कब ऐनक टूटी,
ये पता भी ना चला 

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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