ख्वाबों को ऐनक की तरह नज़रो पे चढ़ाये रखा,
हर शा में अपने ही ख्वाबों को निहारता रहा,
मंज़िल को पाने की आरज़ू आंखों में लिए,
कुछ यूं अकड़ के चला की,
समाज की एक ठोकर से ,कब ऐनक टूटी,
ये पता भी ना चला
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