रूहानी एहसास
कोहरे और धुंध को चीरती हई धूप,
जब आंगन में
नीम के पेड़ से छन के आया करती थी I
वो सुबह थी कितनी सुहानी,
जैसे सर्दियों में,
खुले आंगन में अलाव जलाए बैठी नानी I
उन दिनों सुबह कितनी जल्दी हुआ करती थी,
गौरैया की चहक उठो उठो कह दंभ भरती थी I
उस प्यारी सी आवाज से जब नींद टूटा करती थी,
तब होठों पर मुस्कान बरबस बरस पड़ती थी I
यूँ लगता था किसी ने प्यार से गालों को सहलाया हो,
फूलों की महक,इन्द्रधनुषी रंगों से, मानों मन भर आया हो I
इतनी सुहानी सुबहों की अब मिठास कहाँ से लाऊँ,
बचपन का वह रूहानी एहसास कहाँ से लाऊँ I
आज भी याद आती है गाँव में बीती वो गर्मियों की छुट्टियाँ,
भौंरें,बाटी,कंचे,ताश की पत्तियों संग आम के बगीचों की मस्त्तियाँ I
मिट्टी के चूल्हें में पकी वो सौंधी रोटी,
धुएँ की महक से मीठी हो जाया करती थी,
जब कुनकुनी धूप में माँ की ममता,आवाज लगाया करती थी I
जाने क्यूँ आज मन गाँवों की खूबसूरत गलियों में भटक रहा है,
बचपन में जीने को एक बार और जी मचल रहा है I
विजेन्द्र वर्मा अनजान
नगरगाँव (जिला-रायपुर)
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