हे मृत्यु
तुम भले ही जीत जाओ
इस तन से
पर मुझे नहीं जीत पाओगी
मन से
मैं आत्मा हूँ
अमर हूँ
अजर हूँ
जब चाहूंगी चली जाऊँगी
तू जितने तन मारेगी
मैं उतने मन पाऊँगी
हे मृत्यु
पर तेरे काबू नहीं आऊँगी
वीरेन्द्र सिंह
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