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अधूरापन

Vivek Chandra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अधूरी सी तुम अधूरे से हम
        
                                                    
                            
रही ये जिंदगी थोड़ी सी कम
तरसता ही रहा ये जनम.....

कशिश भी कम नहीं
कोशिश भी कम नहीं
मिटा न सके फिर भी ये गम....

दिल चुप भी बहुत है
चीखता भी भी है हरदम
तुझ बिन नहीं जीना है
तुझ बिन क्यों जिंदा हैं हम
संग तेरे क्यों नहीं ऐ मेरे सनम.....

अबकी बार मिल जाना
मेरी हो जाना अगले जनम
ए ईश् मेरे बस इतना हो रहम....

अधूरी सी तुम अधुरे से हम
रही ये जिंदगी थोड़ी सी कम......

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले
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