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संकल्प

Vivek Chandra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            न कटूँगी, न जलूँगी, न मिटूँगी, न मरूँगी।
        
                                                    
                            
मैं थी, मैं हूँ, मैं रहूँगी।

जब तक दरिया में है पानी,
और आसमान नीला है,
जब तक सूरज तेज से चमके,
और अँधेरा काला है,
मैं थी, मैं हूँ, मैं रहूँगी।

जिस पर टूट पड़ी सदियों से
अरबों लहरें सागर की,
मैं वो निश्छल शीला हूँ,
हर आफत जिसने है झेली।
जीने की अविनाशी चाह का अंश बनूँगी।
मैं थी, मैं हूँ, मैं रहूँगी।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।

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5 वर्ष पहले
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