शिमला। हाईकोर्ट की ओर से बढ़ाई गई आरटीआई फीस के सामने राज्य सूचना आयोग के हाथ खड़े हो गए हैं। आयोग ने कहा कि हाईकोर्ट के अपने आरटीआई नियमों को आयोग में चुनौती नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट को आरटीआई एक्ट में अपने नियम बनाने का अधिकार है। 10 रुपये की जगह 100 रुपये आवेदन फीस को गलत ठहराने वाली एक शिकायत पर आयोग ने कहा कि इसे इन्कवायर करने का आयोग के पास कोई आधार नहीं है। अगर नियम तार्किक नहीं हैं तो इस पर कंपीटेंट कोर्ट में चुनौती दी जाए। इसी के साथ शिकायत बंद कर दी। यह आदेश सूचना आयुक्त केडी बातिश ने जारी किए हैं।
आवेदक तन्वी प्रवीण ने 4 जनवरी, 2014 को अदालती मामलों से संबंधित जानकारी के लिए आरटीआई में आवेदन दिया। इसे जन सूचना अधिकारी ने इस ऑब्जर्वेशन के साथ लौटा दिया कि आवेदक की दरख्वास्त हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित प्रारूप पर नहीं है। इसमें कहा कि आवेदन फीस 100 रुपये है। इसी तर्क के साथ 10 रुपये के आईपीओ के साथ दरख्वास्त लौटा दी गई। इसके बाद तन्वी ने आयोग में यह शिकायत 7 मार्च, 2014 को आरटीआई एक्ट की धारा 18 (1) के तहत बतौर जनसूचना अधिकारी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कांगड़ा के खिलाफ दायर की थी। शिकायतकर्ता ने साथ में 26 अप्रैल, 2011 को जारी केंद्रीय कार्मिक विभाग का पत्र भी संलग्न किया। यह जम्मू-कश्मीर को छोड़ सभी राज्यों के मुख्य सचिवों, सभी उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के रजिस्ट्रारों को जारी हुआ है। पत्र में सभी कंपीटेंट अथॉरिटी को फीस के नियमों को रिव्यू करने को कहा गया है। इसके अनुसार फीस ऐसी नहीं होनी चाहिए, जो आरटीआई के इस्तेमाल को निरुत्साहित करे। आयोग के नोटिस पर जनसूचना अधिकारी के प्रतिनिधि ने जवाब दायर किया। आयोग के अनुसार यह जवाब दर्शाता है कि हाईकोर्ट ने 12 अगस्त, 2013 को आरटीआई एक्ट की धारा 28 के तहत नियम बनाए हैं। ये नियम कार्मिक विभाग से 26 अप्रैल, 2011 को प्रेषित पत्र के बाद बनाए गए हैं। अगर ये नियम तार्किक नहीं हैं तो इन्हें कंपीटेंट कोर्ट में उपयुक्त प्रक्रिया के साथ चुनौती दी जा सकती है।