प्रदीप द्विवेदी
बांदा। शिक्षण सत्र के करीब दो माह बीतने को हैं, अभी तक परिषदीय विद्यालयों में पाठ्य-पुस्तकें नहीं पहुंच सकीं जबकि शिक्षा महकमा 85 फीसदी पुस्तकें वितरित करने का दावा कर रहा है। बिना किताबों के छात्र-छात्राएं कक्षा में खाली समय बिता कर घर लौट रहे हैं। किताबें समय से नहीं मिलने के कारण विद्यार्थियों के साथ उनके अभिभावक भी परेशान हैं। विद्यार्थी किसी तरह ‘जुगाड़’ से पढ़ाई कर रहे हैं। सोमवार को कई छात्र-छात्राओं ने ‘अमर उजाला’ से अपनी पीड़ा जाहिर की।
सर्वशिक्षा अभियान का जिले में खुला माखौल उड़ाया जा रहा है। शासन ने गत 15 जुलाई को शिक्षा महकमे को सख्त निर्देश दिए थे कि 31 जुलाई तक हर हाल में सभी छात्र-छात्राओं में पाठ्य-पुस्तकों का वितरण हो जाना चाहिए। शासन के इस फरमान की शिक्षा महकमे में जमकर धज्जियां उड़ रही हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों में तो दूर जिला मुख्यालय में भी अभी तक छात्र-छात्राओं तक पुस्तकें नहीं पहुंच सकी हैं। शिक्षा महकमे की लापरवाही का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शिक्षण सत्र 2012-13 के दो माह बीत रहे हैं और जिले में पुस्तकें आने के बावजूद अभी वितरित नहीं हो सकीं। बिना किताबों के विद्यालयों में पठन-पाठन का कार्य प्रभावित है। आर्यकन्या इंटर कालेज की कक्षा सात की छात्रा प्रिया सिंह ने बताया कि अभी तक किताबें नहीं मिलीं। दो किताबें एक छात्रा से ली है। गाइड बुक के जरिए किसी तरह कक्षा का काम पूरा करती है जबकि कक्षा आठ की छात्रा गरिमा त्रिवेदी बेसिक शिक्षा विभाग की हीलाहवाली से क्षुब्ध है। उसने बताया कि शिक्षण सत्र के दो महीना बीत गए। यदि किताबें नहीं मिलीं तो परीक्षा की तैयारियां कब और कैसे करेंगी।
कक्षा छह की छात्रा सुधा वर्मा व मनोरमा वर्मा ने बताया कि सरकारी पुस्तकें दुकानों में भी नहीं मिलती हैं, जिससे खरीदकर काम चलाया जा सके। स्कूल में किताबों के लिए आज-कल किया जा रहा है।
इसी प्रकार कक्षा छह की छात्रा चित्रा यादव व अनामिका कहती हैं कि बिना किताबों के उनका विषय पिछड़ रहा है। स्कूल में टीचर काम कराती जा रही हैं, लेकिन बिना किताबों के उनके कुछ समझ में नहीं आता। किताबें कब तक मिलेंगी, कुछ कहा नहीं जा सकता।