बस्ती। गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. माता प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती है, यह असीम है। अध्ययन करना, उसका बोध प्राप्त करना, उसे अपने आचरण में उतारना और उसका प्रचार करना, ज्ञान के यही चार सोपान हैं।
वह गुरुवार को एपीएन पीजी कॉलेज में राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन की ओर से आयोजित पांडुलिपि विज्ञान और पुरालिपि शास्त्र पर 21 दिवसीय कार्यशाला के समापन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। अक्षर पद की व्युत्पत्ति देते हुए प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि इस संसार में सब कुछ क्षर होने से नाशवान है। एक मात्र अक्षर ही अक्षय है। ऐसे में वही ब्रह्म है। इस अक्षर ज्ञान के कारण ही मानव जाति समस्त प्राणियों में श्रेष्ठ मानी जाती है। गोरखपुर विश्वविद्यालय में संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग के प्रो. करुणेश शुक्ल ने कहा कि लिपियों का अध्ययन चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में इस कार्य में लगे लोग साधुवाद के पात्र हैं।
कार्यक्रम की समन्वयक डा. रीता त्रिपाठी ने कार्यक्रम की उपलब्धियों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि 21 दिनों तक चले इस कार्यक्रम में 75 व्याख्यान हुए। इसमें 30 प्रतिभागियों को प्राचीन पांडुलिपियों के अध्ययन का अभ्यास कराया गया। उन्हें पांडुलिपियों के रख-रखाव की जानकारी भी दी गई। विशिष्ट अतिथि के रूप में डीएसओ पूरन सिंह चौहान ने पांडुलिपि विषय पर प्रकाश डाला।
इस मौके पर डा. दुर्गेश पांडेय, रमेश तिवारी, अंबरीश पांडेय, डा. मनोज कुमार, विनय, वरुणेश कुमार शुक्ल, त्रिपुरारि मिश्र, अतुल कुमार शुक्ल, धर्मेंद्र मिश्र, दिनेश कुमार दूबे, रमेश, मो. इस्माइल, निवेदिता पांडेय, पूनम तिवारी आदि मौजूद रहे।