मऊ (चित्रकूट)। किसानों की जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए आई जिप्सम से खेत तो उपजाऊ बनी नहीं, क्योंकि किसानों ने इसे लेने में रुचि नहीं दिखाई पर बाहर पड़े-पड़े इनकी बोरियां जरूर उपजाऊ बन गईं और इनमें घास जम आई। कई लाख की कीमत की बोरियां बाहर पड़ी सड़ रही हैं। इनका कोई पुरसाहाल नहीं।
जानकारी के मुताबिक, ऊसर जमीन सुधार के लिए किसानों को सब्सिडी में जिप्सम खाद दी जाती है। मऊ के बीज गोदाम में इस खाद की लगभग दो हजार बोरियां खुले में पड़ी हैं। इनमें घास जम आई है। इन्हें कोई लेने वाला नहीं और अंदर रखी नहीं गईं, जिससे ये बेकार हो गईं। जानकारी के मुताबिक 2011 में 6520, 2012 में 9500, 2013 में चार हजार बोरियां आई थीं। गोदाम प्रभारी देवेंद्र तिवारी ने बताया कि काफी जोर देने समझाने के बाद पाठा के किसान तो इसे ले गए पर बाकी जगहों के किसानों ने इसे लेने में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं दिखाई।
नब्बे फीसदी सब्सिडी पर दी जाती है
गोदाम प्रभारी ने बताया कि जिप्सम खाद की एक बोरी 138 रुपये की होती है। नब्बे फीसदी अनुदान के बाद इसकी कीमत 13.80 रुपये पड़ती है। इसके बाद भी इसे लेने में कोई रुचि नहीं लेता।
क्या है जिप्सम खाद
जिप्सम मिट्टी को उपजाऊ बनाने में सहायक होती है। इसमें सल्फर की मात्रा ज्यादा होती है। पलेवा के पहले खेत में इसे डाल दिया जाता है। इसके बाद बीज को अंकुरित करने की मिट्टी की क्षमता बढ़ जाती है। पैदावार भी बढ़ती है। आमतौर पर बरसात में बारिश के पहले इसे बंजर खेत में डाला जाता है और फिर बारिश होने के बाद खेत जोत दिया जाता है। इससे वहां की मिट्टी उपजाऊ हो जाती है। इस खाद में कीड़ा नहीं लगता।
किसानों को इसमें रुचि नहीं
किसानों को जिप्सम की बोरी लेने के प्रति उत्साह नहीं है, बल्कि वे यूरिया खाद लेने में दिलचस्पी दिखाते हैं। किसान कहते हैं कि उनकी जमीन उष्ण नहीं है और खाद उष्णता वाली जमीन के लिए लाभकारी है। भिटारी के हनुमान प्रसाद पांडे, मऊ के कमलेश शुक्ल, जोरवारा के भूषण, मोहनी के सुभाष चंद्र शुक्ला, सुरौंधा के बसंत लाल मौर्य, दुबारी के प्रेमशंकर पांडे आदि ने बताया कि यहां के खेतों में नमी की कमी नहीं है और ऐसे में इस खाद का कोई मतलब नहीं।
वर्जन
यूरिया के प्रति रुचि दिखाने वाले किसानों को जिप्सम की बोरी लेने के प्रति उत्साह नहीं है। काफी समझाने के बाद भी वे यूरिया खाद लेने में दिलचस्पी दिखाते हैं। गोदाम में इतनी जगह नहीं है कि जिप्सम की बोरियों को अंदर रखवाया जा सके। हालांकि उन्होंने यह बात मानी कि पानी और हवा से इसका असर कम हो जाता है।-देवेंद्र तिवारी, गोदाम प्रभारी