देवरिया। ईद के अवसर पर मुस्लिम घरों में बनने वाली सेवईयां सभी की पहली पसंद होती है। चाशनी में लिपटी सेवईयों का क्या कहना? बुजुर्ग हों या बच्चे सभी इसके कद्रदान होते हैं। मुस्लिम हो या हिंदू सभी को यह बहुत भाती है। सेवई का नाम सुनते ही लोगों के मुंह में बरबस पानी आ जाता है। सेवई के बारे में कोई इस्लामिक मान्यता तो नहीं है, लेकिन घरों में पहुंच ऐसी है कि इसके बगैर ईद फीकी रहती है। सेवई के बिना ईद की कल्पना नहीं की जा सकती है।
मौलाना अहमद रजा मिस्बाही कहते हैं कि मीठा चीज मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम को पसंद थी। उन्होंने मीठा खाकर ईदगाह जाने को कहा है। इसका अंदाजा रसूल-ए-इस्लाम की हदीस से होता है। उन्होंने फरमाया है कि ईद की नमाज से पहले मीठा चीज खाकर ईदगाह जाना चाहिए। यह सुन्नत है। यह हुक्म-ए-रसूल (स.) भी है। रमजान के शुरुआती दिनों से शहर के तहसील रोड पर सेवईयों की दुकानें सजने लगती हैं।
इस वर्ष भी 10 अस्थाई दुकानें लगी हैं। अलविदा के बाद खरीदार बाजार में उमड़ पड़ते हैं। कारोबारी वाराणसी से सेवई का आयात करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, शहर में 100 टन से अधिक सेवई की खपत हो जाती है। बाजार में किमामी सेवईयों की मांग अधिक रहती है। इसकी विशेषता यह है कि इसका स्वाद लाजवाब होता है।
खोवा, ड्राई-फ्रूट्स, देशी घी, दूध और चीनी को मिलाकर बनी सेवई को लोग तारीफ करते नहीं थकते। सभी के जुबान पर इसकी चर्चाएं रहती हैं। इसे अपने रिश्तेदारों, दोस्तों, गरीबों और परिचितों को भी खिलाया जाता है। सेवई के थोक कारोबारी मुन्ना, रईस और टीपू ने बताया कि रमजान में सेवई की बिक्री अधिक होती है। उनके मुताबिक 50-60 रुपये किलोग्राम की सेवई अधिक बिकती है।
पैसे वाले लोग 70 से 80 रुपये किलोग्राम की सेवई खरीदते हैं। 100 रुपये प्रति किलोग्राम वाली सेवई की बिक्री कम होती है।