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भूखों की नहीं कोई डगर

Hardoi Updated Tue, 28 May 2013 05:30 AM IST
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हरदोई/अतरौली। गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही अनाज, आवास, रोजगार प्रशिक्षण, स्वयं सहायता समूह, ऋण, पेंशन आदि योजनाओं पर प्रति वर्ष जिले में करोड़ों रुपये खर्च हो रहे, पर जिले में हजारों लोग दो वक्त की रोटी को तरसते नजर आ रहे हैं। तमाम लोग ऐसे हैं, जिन्हें किसी भी योजना का लाभ नहीं मिल पाया और वे रोजी रोटी के लिए संघर्ष करते नजर आ रहे हैं। उनके इस संघर्ष में बच्चे का भविष्य कूड़ा बीनने एवं मेहनत मजदूरी में कैद हो गया है। आखिर जिस उम्र में बच्चों को स्कूल जाना चाहिए वे उस उम्र में दो वक्त की रोटी को मेहनत मजदूरी कर गरीबी एवं लाचारी के पाटों के बीच में पिस रहे हैं।
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केस एक- शहर के मोहल्ला इदरीसगंज निवासी रिजवाना के शौहर अनवर किसी तरह से मेहनत मजदूरी कर परिवार का पेट पालते थे। 12 वर्ष पहले अनवर का इंतकाल हो गया, तो तीन बच्चों की जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गई। किराए के मकान में रह रही रिजवाना को दो वक्त की रोटी के लिए कढ़ाई का काम करना पड़ रहा, पर उससे पूरा नहीं पड़ रहा, तो बच्चे जो कि क्रमश: सात, नौ और 11 साल के हो गए हैं, दुकानों पर मेहनत मजदूरी कर रहे हैं। इस परिवार को किसी कल्याणकारी योजना का लाभ न मिल सका। यहां तक कि सस्ते दामों पर अनाज तक नहीं मिल सका। बेबसी में बच्चे स्कूल भी न जा सके और पूरा परिवार दो वक्त के भोजन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
केस दो-खजांची टोला निवासी नाजिर तनहा है। उनकी आंखों की रोशनी भी चली गई। रहने के लिए भी खंडहर हो चुका जर्जर मकान है। रोजीरोटी के कोई साधन नहीं। विकलांग पेशन और बीपीएल राशनकार्ड मिल जाता तो मुश्किलें कुछ आसान हो जाती, पर कोई सहायता न मिल पाने के कारण इधर उधर मांग जांच कर भेंट भरने के लिए घूमते रहते हैं। कहते हैं कि पता नहीं, सरकार कब उनके जैसे गरीबाें की सुधि लेगी।
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केस तीन- शहर के मोहल्ला इदरीश गंज निवासी नाहिद के शौहर फिरोज का पांच वर्ष पहले इंतकाल हो गया। चार बच्चे हैं। जिनकी जिम्मेदारी नाहिद पर है। लोगों के घरों में झाडू़ पोंछा कर दो वक्त की रोटी तलाश रही नाहिद का कहना है कि आखिर हम गरीबों की कब सुनी जाएगी। रहने को घर नहीं खाने को रोटी नहीं ऐसे में तो अपना खुदा ही रखवाला है, जिसके रहमोकरम पर वह दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रही है।
केसा चार-दिनेश पुत्र शंभूदयाल निवासी चचरी मजरा अतरौली का मकान कच्चा है और फूस-पतवार की मदद से बना है। इनके पास न तो बीपीएल राशन कार्ड है और न ही कोई सरकारी सहायता मिली है। अपनी खेती न होने के कारण दो बच्चों के साथ यह परिवार मुफलिसी में गुजर बसर करते हुए दूसरे किसानों से बटाई पर खेती लेकर जीविका जुटाता है।
केस पांच- श्रीधर पुत्र भगौती प्रसाद निवासी चचरी मजरा अतरौली का मकान कच्चा है और फूस-पतवार की मदद से बना है। इनके पास भी न तो बीपीएल राशन कार्ड है और न ही कोई सरकारी सहायता मिली है। कच्चे दो बीघा खेती के जरिए यह किसान परिवार का पेट पालन करता है।
केस छह- जंगा पुत्र भोलई पासी निवासी ग्राम कूंड़ा मजरा भटपुर के पास मकान के नाम पर पतवार से निर्मित मड़ैया है। आय का जरिया मजदूरी है। परिवार में चार बच्चों सहित मुफलिसी में काम चलता है। इस परिवार को न तो बीपीएल का राशन कार्ड मिला है और न ही किसी सरकारी योजना से कोई लाभ दिया गया है। यह उदाहरण तो महज बानगी, न जाने कितने लोग हैं, जो मुफलिसी में रहने को मजबूर हैं और उन्हें सरकारी सहायता नहीं मिल पा रही है।
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‘जब तक योजनाओं के क्रियान्वयन यथार्थ के धरातल पर नहीं किया जाएगा, तब तक पात्रों को लाभ मिलना संभव नहीं है। योजनाओं में घालमेल करने वालों के खिलाफ कार्रवाई तो होनी चाहिए, साथ ही इनको बचाने का काम करने वालों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।’ फखरुल इस्लाम फक्कन, सामाजिक कार्यकर्ता
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‘अगर कोई पात्र व्यक्ति बीपीएल व अन्त्योदय योजना के लाभ से वंचित होता है तो वे इस ओर शिकायत करें वे सर्वे की समीक्षा करने के साथ ही नियमानुसार कार्रवाई करेंगे।’ एसपी सिंह, डीएसओ
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‘पात्रों को योजना का लाभ मिल सकें इसके लिए वह सचेत रहती हैं। जो लोग उनके यहां शिकायत लेकर आते हैं, उसके लिए वह डीएम और सीडीओ को पत्र द्वारा अवगत करा उनका कार्ड बनवाने का प्रयास करती हैं। फिर भी कई पात्र योजनाओं से वंचित हैं, उनके लिए वह प्रयास करेंगी।’ ऊषा वर्मा, सांसद
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