मथुरा। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना में 30 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली सात सड़कों का निर्माण कानूनी दांवपेंच में उलझ गया है। दो बडे़ अधिकारियों पर कार्यवाही के बाद भी कानूनी गुत्थी सुलझने के बजाए और उलझती गई।
दरअसल, चार साल के इंतजार के बाद दिसंबर 2012 में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत जनपद को सात सड़कों के निर्माण के लिए करीब 30 करोड़ रुपये की स्वीकृति मिली थी। जनवरी 2013 में टेंडर प्रक्रिया शुरू होते ही निर्माण पर ग्रहण लग गया। तकनीकी निविदाएं स्वीकृत होने से पहले ही बडे़ घपले की शिकायत केंद्र सरकार से कर दी गई। इसमें दो ठेेकेदारों को ही बड़ी हुई दरों पर ठेका देने की योजना से अवगत कराया गया था। केंद्र के निर्देश पर उच्चस्तरीय कमेटी ने इसकी जांच की तो शिकायत सही मिली। इस पर टेंडर प्रक्रिया निरस्त कर दी गई और इससे जुडे़ अधिशासी अधिकारी और अधीक्षण अभियंता को हटा दिया गया।
इसके बाद ग्रामीण अभियंत्रण सेवा ने एक बार फिर टेंडर प्रक्रिया अपनाई। इस बार तीन सड़कों के लिए ही ठेकेदार सामने आए। दोबारा शुरू की गई टेंडर प्रक्रिया के खिलाफ पूर्व के दोनों ठेकेदारों ने हाईकोर्ट की शरण ले ली। अब ग्रामीण अभियंत्रण सेवा के अधिकारियों ने पूरी प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। इससे एक बार फिर जिले की सड़कों का निर्माण ठंडे बस्ते में पड़ गया है।
चार साल पहले मिले थे 31 करोड़
चार साल पहले प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना में जनपद को 31 करोड़ रुपये मिले थे। इससे 10 सड़कों का निर्माण किया गया था। चार साल बाद दिसंबर 2012 में एक बार फिर 30 करोड़ से सात सड़कों के निर्माण की स्वीकृति मिली है।
सांसद-विधायक निधि पर निर्भर अधिकारी
प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना में धन के अभाव के चलते ग्रामीण अभियंत्रण सेवा के इंजीनियर सांसद व विधायक निधि पर ही निर्भर होकर रह गए हैं। हालांकि इस बार तीन लोहिया ग्रामों के लिए 60 लाख रुपये जरूर मिले हैं।
मामला कोर्ट में लंबित है, इसलिए कोई भी काम अब तक शुरू नहीं हो पा रहा है। कुछ भी नहीं कहा जा सकता है कि कब तक यह मामला सुलझ पाएगा।
- संजय अग्रवाल
एक्सईएन, पीएमजीएसवाई, मथुरा