मऊ। जिले में जिन गन्ना किसानों के लिए सहकारी चीनी मिल घोसी की स्थापना की गई थी उसका लाभ यहां के लोगों को कम बाहरी जनपदों के गन्ना माफियाओं और दलालों को मिल रहा था। इसका खुलासा एमडी ने दस्तावेजों का निरीक्षण किया तो सामने आया। दस्तावेजों में बाहरी जनपदों के गन्ना किसानों से ज्यादा खरीद दर्ज है। घाटे का मामला बताकर पर्ची वितरण को फ्री करने से मामला प्रकाश में भी नहीं आ रहा था। इसके चलते अरबों के घाटे में चल रही घोसी चीनी मिल में और भी घोटाले की बू आ रही है। प्रारंभिक जांच में जो कमियां उजागर हुईं उसकी शिकायत यहां के किसान वर्षों से कर रहे थे। पूर्व में एक बार जांच भी बैठाई गई थी लेकिन कार्रवाई के नाम पर छोटे कर्मचारियों तक ही सिमट के रह गई थी। चीनी मिल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि इतनी बड़ी कार्रवाई हुई है।
सहकारी घोसी चीनी मिल की स्थापना पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी 1992 में इस उद्देश्य से की थी कि यहां के किसानों को अपना गन्ना लेकर दूसरे जिलों में नहीं जाना पड़ेगा। पूर्व में यहीं चीनी मिल काफी फायदे में रही लेकिन डबल प्लांट लगने के बाद इसे किसी की नजर लगनी शुरू हुई और अव्यवस्थाएं फैल गई। डबल प्लांट लगने के बाद यह जरूर हुआ कि यहां गन्ना की कमी हुई लेकिन यहां गन्ना उत्पादन की अपार संभावना के बाद भी खेती में कोई वृद्धि के सार्थक न तो प्रयास किए गए और न ही किसानों को समय से गन्ने का भुगतान और ना ही संसाधन उपलब्ध कराए गए। पर्ची वितरण में धांधली और घटतौली में पारदर्शिता न बरते जाने की शिकायत यहां दशकों से रही लेकिन अभी तक किसी ने भी इसकी गहनता से जांच करने की जरूरत नहीं समझी। पूर्व में तत्कालीन जीएम शाहिद परवेज ने जांच भी बैठाई तो यह फाइलों में दबकर रह गई। इसके बाद यहां के गन्ना किसानों ने भी हार मान ली। आज घोसी चीनी मिल दो अरब 60 करोड़ से भी अधिक घाटे में चल रही है। इस घाटे को सुधारने की बजाए उसमें वृद्धि हो रही है, लेकिन आखिरकार घाटा क्यों और कैसे हो रहा है इसकी फिक्र किसी ने नहीं की। मिल के अधिकारी गन्ना की कमी बताकर जिन बाहरी दलालों को फायदा पहुंचाया गया उन्होंने न सिर्फ यहां के किसानों को कमजोर किया बल्कि घाटे को भी बढ़ाने में भूमिका अदा की। एमडी रवि प्रकाश अरोड़ा द्वारा पांच अधिकारियों को सस्पेंड करने की कार्रवाई से न सिर्फ मऊ बल्कि लखनऊ तक हड़कंप मचा है।