रामनगर। प्रसिद्ध रामलीला के चौदहवें दिन भगवान श्रीराम की चरणपादुका लेकर भरत ने अयोध्या के लिए प्रस्थान किया। सिंहासन पर चरणपादुका को स्थापित करने के बाद वह नंदीग्राम में वास को गए। गुरुवार को हुई लीला में अयोध्या कांड के 306 से 326 तक का प्रसंगों का मंचन किया गया।
भरत जी श्रीराम से कहते हैं कि हे नाथ, स्वामी गुरु की आज्ञा पाकर आप के तिलक के लिए सभी तीर्थों का जल लाया हूं। वह चित्रकूट के पावन स्थलों को घूमने की इच्छा प्रकट करते हैं तो श्रीराम उन्हें अनुमति प्रदान करते हैं। चित्रकूट का पांच दिनी दर्शन कर सभी भगवान श्रीराम से विदा मांगते हैं। श्रीराम संकोचवश कुछ नहीं कह पाते। श्रीराम भरत को बहुत समझाते हैं। आखिर में श्रीराम भाई भरत को अपनी चरण पादुका (खड़ाऊं) देते हैं। जिसे वह सिर पर रख कर अयोध्या जाने के लिए भगवान से आज्ञा मानते हैं। श्रीराम और भरत गले मिलते हैं और भरत माता सीता के पैर छू कर उनसे आशीर्वाद लेते हैं और सभी के साथ अयोध्या के लिए प्रस्थान करते हैं। जबकि श्रीराम और लक्ष्मण राजा जनक के पास पहुंच कर उनसे कहते हैं कि हे महाराज, आप समाज समेत वन में बहुत दुख उठा चुके अब आप भी लौट जाइए। विदाई के दौरान श्रीराम माता कैकेयी से कहते हैं कि यह सब विधि का विधान है। आप इसमें अपना दोष मत मानिए। सब को विदा कर श्रीराम कुटी में लौटते हैं और निषादराज से भी वापस लौटने का आग्रह करते हैं। जिस पर निषादराज कोल और भीलों के साथ भी वन से प्रस्थान करते हैं।
उधर, भरत परिजनों समेत अयोध्या आ जाते हैं। जनक जी भी अवध में चार दिन रहने के बाद राजकाज समझा कर तिरहुत चले जाते हैं। इस मंचन में यहां पर श्रीराम की आरती की जाती है। नगरवासी गुरु की आज्ञा मानकर अयोध्या में सुखपूर्वक रहने लगे। भरत अपने भाई शत्रुघभन से सभी माताओं की सेवा करने को कहते हैं। दोनों भाई गुरु वशिष्ठ के घर पहुंचते हैँ और उन्हें प्रणाम करते हैं। भरत मंत्रोच्चार के बीच चरणपादुका को सिंहासन पर स्थापित करते हैं और गुरु की आज्ञा से नंदीग्राम में जाकर पर्ण कुटी बनाकर वहीं निवास करते हैं।