अल्मोड़ा। पर्वतीय क्षेत्र में अधिकतर अखरोट की परंपरागत बीजू और कागजी प्रजाति के पेड़ हैं लेकिन कुछ इलाकों में विदेशी प्रजाति पिकन नट के पेड़ भी लोगों ने लगाए हैं। इस प्रजाति के अखरोट आकार में लंबे होते हैं और इसका आवरण मुलायम होने के कारण यह आसानी से टूट जाते हैं। इस प्रजाति के अखरोट की यहां अच्छी संभावनाएं हैं। हालांकि इसके पौध उद्यान विभाग की नर्सरी में नहीं हैं। लोग इस प्रजाति के पौधे बाहर से लाकर अपने खेतों में लगा रहे हैं।
पिकन नट अमेरिकी प्रजाति का अखरोट है। अमेरिका में इसकी व्यावसायिक खेती भी होती है। आम तौर पर उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में बीजू और कागजी प्रजाति के ही अखरोट के पेड़ हैं। बीजू अखरोट का बाहरी आवरण काफी कठोर होता है। इसकी गिरी भी एक साथ नहीं निकलती है। वहीं कागजी अखरोट बीजू की अपेक्षा आसानी से टूट जाता है। इसका आवरण पतला होता है। बीजू अखरोट के पेड़ को कागजी बनाने के लिए टहनियों में कागजी अखरोट की ग्राफ्टिंग की जाती है।
नगर में कुछ लोगों द्वारा घर के पास लगाए गए पिकन नट प्रजाति का पेड़ फल देने लगा है। नरसिंहबाड़ी में लोकेश वर्मा के यहां पिकन नट का पेड़ है। आजकल इस पेड़ में फल तैयार हुए हैं। श्री वर्मा बताते हैं कि उनके परिजन पिकन नट के पौधे को कुछ वर्ष पूर्व कश्मीर से आए थे। इसके अलावा अल्मोड़ा में इस प्रजाति के चार-पांच पेड़ और भी हैं। इसके फल का आवरण बेहद नाजुक होता और हाथ से दबाने पर भी टूट जाता है। लोगों का कहना है कि यदि पिकन नट को बहुतायत लगाया जाए तो काश्तकारों को अच्छा लाभ मिलेगा। दूसरी तरफ उद्यान विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस प्रजाति के पेड़ों की मांग नहीं है और सरकार की ओर से भी इसके पौध उपलब्ध नहीं कराए जाते।