हरिद्वार। महिलाएं घर के ‘गृहमंत्री और वित्तमंत्री’ की भूमिकाएं निभाती हैं। यह बात भी सच है कि राष्ट्रीय बजट एक तरह से सीधे महिलाओं को प्रभावित करता है। ऐसे में आम बजट महिलाओं को खास अपेक्षाएं हैं। पहला तो हर गृहणी छह या नौ नहीं बल्कि सभी मिलने से सिलेंडर सस्ते चाहती हैं। आटा, दाल, चीनी आदि के हर छह महीने में बढ़ते दामों से बिगड़ते घर के बजट से तंग महिलाएं इनमें नियंत्रण की मांग करती हैं। महिलाएं चाहती हैं कि गैस सिलेंडर के बढ़ते दामों के चलते विकल्प के तौर पर इस्तेमाल हो रहे माइक्रोवेव और इलैक्ट्रिक चूल्हे की कीमत आम आदमी की पहुंच में हो। अन्य घरेलू सामानों पर बेवजह के टैक्स का भार कम कर उन्हें सस्ता करने की भी महिलाएं जोर-शोर से वकालत करती नजर आ रही हैं। बजट को लेकर क्या है शहर की आम गृहणियों की राय आइए उन्हीं से जानते हैं।
एक-
कृष्णानगर में रहने वाली कोमल का चार सदस्यों का छोटा परिवार है। कहती है कि दोनों बच्चे स्कूल पढ़ते हैं। हर साल फरवरी-मार्च में सरकार का बजट उनका घर का बजट बिगाड़ देता है। अप्रैल का महीना बच्चों के दाखिले का रहता है, ऐसे में बच्चों की पढ़ाई के बोझ के बीच घर का खर्च मैनेज करना कठिन हो जाता है। वह चाहती हैं चीनी, चाय, दाल, आटा, चावल आदि रोजमर्रा की वस्तुओं से सरकार अनावश्यक टैक्स कम करे। साथ ही इनके दामों को सरकारी नियंत्रण में रखा जाए।
दो-
छह सदस्यों के परिवार में रहने वाली विष्णुगार्डन की शांति देवी की समस्या आम गृहणियों की तरह है। कहती हैं एक सिलेंडर 15 से 18 दिन ही चल पाता है, जब से नई व्यवस्था शुरु हुई हो दो महंगे सिलेंडर ले चुकी हैं। जिनकी कीमत एक हजार रुपये पहुंच गई। नौ सस्ते सिलेंडर की व्यवस्था से चूल्हे की आंच महंगी पड़ रही है। पहले की तरह की सब्सिडी सिलेंडर की व्यवस्था शुरु की जानी चाहिए। ताकि बडे़ परिवार पर भार ज्यादा न पडे़े।
तीन-
मीना भट्ट का कहना है कि एक तरफ सब्सिडी सिलेंडर की सीमा तय हो गई है। वहीं दूसरी ओर पिछले एक साल में सिलेंडर के दामों में करीब 50 रुपये का उछाल आया है। ऐसे में आम आदमी के सामने परेशानी खड़ी हो गई है। विकल्प के तौर पर इस्तेमाल हो रहे माइक्रोवेट और इलैक्ट्रिक चूल्हे की कीमत आम आदमी की पहुंच से ऊपर हैं। इनके दामों में गिरावट आए। ताकि आम आदमी भी इनका उपयोग कर गैस की बचत कर सके। सरकार को बजट में इलैक्ट्रिक सामान पर बढ़ाया गया टैक्स का भार कम करना चाहिए।
चार-
नलिनी कौशिक कहती हैं कि सौदर्य प्रसाधन के दामों भी हर दिन आसमान छू रहे हैं। यही नहीं बच्चों के स्टेशनरी सामान के दाम भी हर साल बढ़ते ही जा रहे हैं। कापी-पैंसल के दामों में हर साल 15 से 20 फीसदी उछाल से देखने को मिलता है। ऐसे में आम आदमी को अच्छे स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना चुनौती होता जा रहा है। स्टेशनरी सामानों में बढ़ती महंगाई पर नियंत्रण होना चाहिए। कंप्यूटर और लैपटॉप के दाम भी आम आदमी की पहुंच में आने चाहिए। ताकि बच्चे तकनीक से बढ़कर चल सकें।