भवाली। समय रहते धुलई और आसपास के लोगों की बात सरकारी तंत्र ने गंभीरता से ली होती तो घोड़ाखाल-धुलई रोड पर शुक्रवार को इस तरह हादसा नहीं होता। अफसरों की लापरवाही का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चार किलोमीटर सड़क को चार साल से अधिक समय लग गया, जो अभी तक पूरी नहीं हुई।
पहले घोड़ाखाल स्थित गोलू देवता के मंदिर पहुंचने के लिए सैनिक स्कूल के कैंपस से होकर गुजरना पड़ता था। वर्ष 2008 में कैंपस की सुरक्षा की दृष्टि से घोड़ाखाल-धुलई संपर्क मार्ग की जरूरत महसूस हुई। जनप्रतिनिधियों के दबाव के बाद शासन ने पीएमजीएसवाई योजना के तहत घोड़ाखाल से धुलई तक चार किलोमीटर संपर्क मार्ग की स्वीकृति देते हुए रोड कटिंग के लिए 62 लाख रुपये स्वीकृत किए। 26 जुलाई 2008 को रोड कटिंग शुरू हुई जिसे 27 जुलाई 2009 तक पूरा होना था। उसके बाद सड़क के ऊपर और नीचे की ओर सुरक्षा दीवारें, सोलिंग और डामरीकरण होने थे।
रोड कटिंग होने के बाद सरकारी तंत्र बजट के अभाव में हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। वर्ष 2009 से 2012 तक धुलई और आसपास के क्षेत्रों में कई बार आवासीय भवनों में भूस्खलन हुआ और जमीन धंसने के कारण कई मकान खतरे की जद में आए। तभी से क्षेत्र के जनप्रतिनिधि संपर्क मार्ग के ऊपर और नीचे सुरक्षा दीवारें बनाने की मांग करते रहे लेकिन नहीं सुनी गई।
संपर्क मार्ग के ऊपर सैनिक स्कूल के आवासीय भवन हैं और नीचे धुलई एवं अन्य तोकों में 200 से अधिक परिवार रहते हैं। ग्रामीणों के आंदोलन के बाद तंत्र की नींद टूटी तो दूसरे चरण में सुरक्षा दीवारों और सोलिंग के लिए 1 करोड़ 47 लाख 54 हजार रुपये स्वीकृत हुए। 18 जून को सोलिंग और दीवार का काम शुरू हुआ है और अब हादसे में एक मजदूर को जान से हाथ धोना पड़ा। यदि रोड कटिंग के बाद सुरक्षा दीवारें बन जाती तो हादसा नहीं होता।