मुनस्यारी/नाचनी (पिथौरागढ़)। मुनस्यारी तहसील के होकरा स्थित बाबा अलखनाथ (शिव जी) के मंदिर में सात, नौ और बारह साल बाद होने वाली खुदा पूजा को लेकर एक सवाल सबके मन में उठता होगा कि हिंदू समाज के लोगों की पूजा का नाम खुदा (अल्लाह) क्यों। कहा जाता है कि मुगल काल में हिंदू समाज के लोगों ने मंदिर और पूजा का अस्तित्व बचाए रखने के लिए इस का नाम खुदा पूजा रखा जो अब तक चला आ रहा है।
मान्यता है कि मुगल काल से पहले लोग बाबा अलखनाथ की सात्विक पूजा करते थे। अलखनाथ को भगवान शिव का अवतार माना जाता है। औरंगजेब के शासनकाल में मुगल सैनिकों के भय के कारण लोगों ने इस पूजा को खुदा पूजा नाम दिया और बकरी काटने लगे। नाचनी निवासी रुद्र सिंह पिपलिया (85) बताते हैं कि मेहता उपजाति के लोग पुरातन काल से भगवान अलखनाथ की पूजा करते थे। मुगल शासनकाल में एक बार लोग बाबा अलखनाथ की पूजा कर रहे थे तो मुगल सैनिकों का जत्था पूजास्थल पर पहुंच गया। सैनिकों ने आयोजन के बारे में पूछा। कुछ बुजुर्गों ने सजग होकर कह दिया कि खुदा पूजा कर रहे हैं। मुगल सैनिक वहां से चल दिए। तब से इस पूजा का नाम खुदा पूजा पड़ गया। बुजुर्ग पिपलिया बताते हैं कि मेहता उपजाति के लोगों की बेटियां जहां जहां ब्याही गईं, वहां भी खुदा पूजा होने लगी। ठाकुर समाज के बाद इस पूजा को अनुसूचित जाति के लोग भी करने लगे।
पदम के पेड़ को पार्वती का प्रतीक माना जाता है
अलखनाथ मंदिर कमेटी होकरा के अध्यक्ष हरक सिंह मेहता बताते हैं कि पदम के पेड़ को पार्वती का प्रतीक माना जाता है। खुदा पूजा के दौरान पदम की पत्तियों को मां पार्वती का आकार देकर मूर्ति के साथ बाबा अलखनाथ का विवाह किया जाता है। पदम की पत्तियां तोड़ते वक्त गरुड़ पेड़ में बैठता है तो शुभ माना जाता है। इसके पीछे भी रोचक कहानी है। कालीनाग जहां पर रहता था वहां पदम का पेड़ था। लोग ज्योंही पदम के पत्ते तोड़ने जाते तो कालीनाग फन उठाता था। लोगों की रक्षा के लिए गरुड़ आते थे तो काली नाग छुप जाता था। तब लोग पदम के पत्ते तोड़ते आ रहे हैं। खुदा पूजा के दौरान नृत्य नंदी डोट्याली (नेपाली) का रूप धरकर नृत्य होता है। कहा जाता है कि नंदी डोट्याली बाबा अलखनाथ के घर में काम करती थी। होकरा, खोयम और गौला तीन गांवों के लोग होकरा के अलखनाथ मंदिर में तो सैंणराथी, समकोट, बला, चौना, वल्थी, नामिक आदि गांवों के लोग अपने गांवों में खुदा पूजा करते हैं।