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छत्तीसगढ़ः 'रमन चाहिए, सरकार नहीं'

सुदीप ठाकुर/ अमर उजाला, रायपुर Updated Mon, 18 Nov 2013 05:35 PM IST
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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने विधानसभा चुनावों से पहले पूरे सूबे में विकास यात्रा निकाली थी। शुरुआत से ही पार्टी आश्वस्त थी कि लोग 'चावल और उनके चेहरे' पर वोट देंगे।



मगर दूसरे दौर के मतदान के आते-आते यहां मुकाबला दिलचस्प मोड़ पर आ गया है। हालत यह है कि जो अजीत जोगी कभी भाजपा की राह आसान करते दिख रहे थे, भाजपा के नेता सबसे ज्यादा निशाना उन्हें ही बना रहे हैं। जिन 72 सीटों पर कल मतदान होना है, उनमें से पिछली बार दो सीटें बसपा को मिली थीं और भाजपा और कांग्रेस दोनों को 35-35 सीटें!
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छत्तीसगढ़ में तीसरी बार सत्ता में वापसी का सपना देख रही भाजपा सरकार पर जनता दल (यू) के प्रदेश महासचिव मनमोहन अग्रवाल की टिप्पणी गौर करने वाली है। वह कहते हैं, 'लोग डॉ रमन को तो मुख्यमंत्री के तौर पर लौटता देखना चाहते हैं, लेकिन उनकी सरकार को नहीं।'
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भाजपा की मुश्किल यह है कि उसे रमन के सौम्य चेहरे के साथ नरेंद्र मोदी के आक्रमक चेहरे की भी जरूरत पड़ी है, जिसके चलते दूसरे दौर में पूरे सूबे में उनकी आधा दर्जन सभाएं करानी पड़ीं। रमन सिंह की व्यक्तिगत उपलब्धि यही है कि भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों को दाग बनने से खुद को बचाए हुए हैं।

कल बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, रामविचार नेताम और राजेश मूणत जैसे दिग्गज मंत्रियों के साथ ही विधानसभा अध्यक्ष धर्मलाल कौशिक जैसे दिग्गजों का फैसला होना है।

इसके अलावा कांग्रेस से विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता रवींद्र चौबे, अमित जोगी, रेणू जोगी और पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा और भूपेश बघेल के क्षेत्रों में भी मंगलवार को मतदान होना है।

इस बार शुरू से ही टिकट वितरण को लेकर भाजपा में नाराजगी रही है, नतीजतन इस दौर में भाजपा के कम से कम चार बागी ऐसे हैं, जो उसे नुकसान पहुंचा सकते हैं। ये हैं, गणेशराम भगत, विमल चोपड़ा, प्रभात मेघावाले और जगजीत सिंह मक्कड़।

पहले दौर में 11 नवंबर को नक्सल प्रभावित बस्तर की 12 और राजनांदगांव जिले की छह सीटों पर मतदान हुआ था। जीरमघाटी में हुए नक्सली हमले की वजह से माओवादी हिंसा ही सबसे बड़ा मुद्दा थी।

मगर कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़कर शांतिपूर्ण तरीके से मतदान हो गया। दूसरे दौर में सुरक्षा बड़ा मसला नहीं है, लेकिन राजनीतिक रूप से मामला इतना संवेदनशील हो गया है कि पहली बार राजधानी रायपुर की चारों विधानसभा सीटों को राजनीतिक रूप से अतिसंवेदनशील घोषित किया गया है। यहां से दो दिग्गज मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और राजेश मूणत मैदान में हैं।

कांग्रेस को लगता है कि वह मैदानी इलाकों में पिछली बार से बेहतर प्रदर्शन करेगी। हालांकि गुटबाजी से घिरी कांग्रेस की शुरुआत में आधी ऊर्जा तो पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के प्रभाव को खत्म करने में ही खर्च हो गई।

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने जोगी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। बल्कि राहुल गांधी ने तो अपनी एक सभा में यहां तक कहा कि 'प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल यदि नक्सल हमले में नहीं मारे जाते, तो वे प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री होते।'

दूसरी ओर भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ जोगी को ही मुद्दा बनाया है। अखबारों में छपने वाले विज्ञापनों, पोस्टरों से लेकर मोदी और रमन सिंह तक के भाषणों में जोगी के एक दशक पहले के तीन वर्ष के शासन को मुद्दा बनाया गया।

छत्तीसगढ़ में इस बार सीपीआई, स्वाभिमान मंच और गोंडवाना गणतंत्र पार्टियां जैसे दलों ने तीसरे मोर्चे की पहल की थी, लेकिन वह कोई कारगर रूप नहीं ले सका।

वहीं दुर्ग में स्वाभिमान मंच के राजेंद्र साहू ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। यहां प्रदेश सरकार के मंत्री हेमचंद यादव के खिलाफ कांग्रेस ने तमाम फॉरमूलों को दरकिनार कर कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा के बेटे अरूण वोरा को मैदान में उतारा है, जोकि पहले ही लगातार तीन बार यहां से पराजित हो चुके हैं।

जिन सीटों पर राजनीतिक पंडितों की नजर है, उनमें दुर्ग जिले की डौंडीलोहारा सीट भी है, जहां से दिवंगत मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी के छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के जनकलाल ठाकुर उम्मीदवार हैं। वह 90 के दशक में यहां से चुनाव जीत चुके हैं।

बसपा यहां बड़ी ताकत भले नहीं बन सकी, मगर सारंगढ़ क्षेत्र से पिछली बार उसके दो विधायक चुनकर आए थे। इस क्षेत्र में बसपा की दावेदारी राज्य सरकार के एक कदम की वजह से मजबूत बताई जा रही है। राज्य सरकार ने जनगणना के आधार पर यहां अनुसूचित जाति के लिए पहले से तय 16 फीसदी आरक्षण को घटाकर 12 फीसदी कर दिया है। सतनामी बहुल इलाकों में इसका खासा विरोध हो रहा है।

छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनाव में अंततः चावल ही बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। मतदाताओं की चांदी है, सरकार किसी की भी बने उसे सस्ता चावल मिलता रहेगा।

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