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Delhi NCR News: अंधा युग के मंचन ने दर्शकों को किया गहन आत्ममंथन के लिए विवश
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संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के ग्रीष्मकालीन नाट्य समारोह के अंतर्गत शुक्रवार को अभिमंच सभागार में धर्मवीर भारती के कालजयी नाटक अंधा युग का मंचन किया गया। सुप्रसिद्ध रंगकर्मी प्रोफेसर रामगोपाल बाजपेयी के निर्देशन में प्रस्तुत इस नाटक ने दर्शकों को युद्ध, सत्ता, प्रतिशोध और मानवीय पतन के प्रश्नों से रूबरू कराया। महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के अंतिम दिन की पृष्ठभूमि पर आधारित अंधा युग भारतीय रंगमंच की सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में गिना जाता है। यह केवल युद्ध की कथा नहीं, बल्कि युद्ध के बाद बची हुई मानसिक, नैतिक और मानवीय विडंबनाओं का दस्तावेज है। नाटक में दिखाया गया विनाश केवल रणभूमि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मनुष्य के भीतर फैलते अंधकार और टूटते मूल्यों का प्रतीक बन जाता है।
धृतराष्ट्र, गांधारी, अश्वत्थामा और विदुर जैसे पात्रों के माध्यम से नाटक मानवीय संवेदनाओं, अपराधबोध, प्रतिशोध और नैतिक संघर्ष की गहरी परतों को उजागर करता है। विशेष रूप से अश्वत्थामा का क्रोध और गांधारी का शाप पूरे नाटक में एक भयावह मानसिक वातावरण निर्मित करते हैं। निर्देशक प्रो. रामगोपाल बाजपेयी ने प्रस्तुति को गंभीर और काव्यात्मक शैली में मंचित करते हुए नाटक की वैचारिक गहराई को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा।
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नई दिल्ली। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के ग्रीष्मकालीन नाट्य समारोह के अंतर्गत शुक्रवार को अभिमंच सभागार में धर्मवीर भारती के कालजयी नाटक अंधा युग का मंचन किया गया। सुप्रसिद्ध रंगकर्मी प्रोफेसर रामगोपाल बाजपेयी के निर्देशन में प्रस्तुत इस नाटक ने दर्शकों को युद्ध, सत्ता, प्रतिशोध और मानवीय पतन के प्रश्नों से रूबरू कराया। महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के अंतिम दिन की पृष्ठभूमि पर आधारित अंधा युग भारतीय रंगमंच की सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में गिना जाता है। यह केवल युद्ध की कथा नहीं, बल्कि युद्ध के बाद बची हुई मानसिक, नैतिक और मानवीय विडंबनाओं का दस्तावेज है। नाटक में दिखाया गया विनाश केवल रणभूमि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मनुष्य के भीतर फैलते अंधकार और टूटते मूल्यों का प्रतीक बन जाता है।
धृतराष्ट्र, गांधारी, अश्वत्थामा और विदुर जैसे पात्रों के माध्यम से नाटक मानवीय संवेदनाओं, अपराधबोध, प्रतिशोध और नैतिक संघर्ष की गहरी परतों को उजागर करता है। विशेष रूप से अश्वत्थामा का क्रोध और गांधारी का शाप पूरे नाटक में एक भयावह मानसिक वातावरण निर्मित करते हैं। निर्देशक प्रो. रामगोपाल बाजपेयी ने प्रस्तुति को गंभीर और काव्यात्मक शैली में मंचित करते हुए नाटक की वैचारिक गहराई को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा।
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