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Yamuna Nagar News: संतों, गुरुओं और ऋषियों के चरणों से पावन हुई धरती
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Tue, 02 Jun 2026 01:48 AM IST
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डॉ. हर्षवीर शर्मा।
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राजेश कुमार
व्यासपुर। व्यासपुर केवल एक ऐतिहासिक गांव ही नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था का भी प्रमुख केंद्र है। व्यासपुर से लेकर तीर्थराज कपालमोचन तक का क्षेत्र सनातन, सिख और संत परंपरा की गौरवशाली विरासत को समेटे हुए है। मान्यता है कि इस पावन भूमि पर भगवान शिव, भगवान श्रीकृष्ण, महर्षि वेदव्यास, गुरु नानक देव, गुरु गोबिंद सिंह, गुरु रविदास तथा पांडवों सहित अनेक संत-महात्माओं ने अपने चरण रखे थे।
व्यासपुर और कपालमोचन क्षेत्र सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहां स्थित ऋणमोचन, कपालमोचन और सूरजकुंड सरोवरों में स्नान करने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। विशेष रूप से गुरु नानक देव जी के प्रकाशोत्सव पर आयोजित विशाल मेले में करीब 10 लाख श्रद्धालु भाग लेते हैं। श्रद्धालु गुरुद्वारा साहिब पहली व दसवीं पातशाही, गुरु रविदास मंदिर, गऊ बच्छा घाट और सूरजकुंड मंदिर में मत्था टेककर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कपालमोचन और ऋणमोचन सरोवर केवल आस्था के केंद्र ही नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक भी हैं। यहां विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग एक साथ आकर श्रद्धा व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि व्यासपुर क्षेत्र को धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से भी विशेष महत्व प्राप्त है।
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कपालमोचन स्थित गुरुद्वारा साहिब पहली व दसवीं पातशाही सिख श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र स्थल है। मान्यता है कि प्रथम सिख गुरु, श्री गुरु नानक देव जी यहां पहुंचे थे और उन्होंने लोगों को मानवता, सेवा और भाईचारे का संदेश दिया था। बाद में दशम पातशाह गुरु गोबिंद सिंह भी इस पावन स्थल पर आए और संगत को धर्म एवं राष्ट्र रक्षा के लिए प्रेरित किया। इसी कारण यह स्थान पहली और दसवीं पातशाही के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दोनों गुरुद्वारा साहिब एक ही परिसर में स्थित हैं।
संत शिरोमणि गुरु रविदास जी का भी व्यासपुर से गहरा संबंध है। गुरु रविदास जी पंजाब जाते हुए यहां पर ठहरे थे। उन्होंने यहां लोगों को समानता, प्रेम, मानवता और जाति-पाति से ऊपर उठकर जीवन जीने का संदेश दिया। कपालमोचन स्थित गुरु रविदास मंदिर इसी ऐतिहासिक स्मृति को संजोए हुए है। रोजाना बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंच कर गुरु रविदास जी को नमन करते हैं। इतना ही नहीं व्यासपुर के आंबेडकर नगर में भी वर्ष 1922 में श्री गुरु रविदास मंदिर की स्थापना हुई थी। मंदिर के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में अब इसका नवीनीकरण चल रहा है। संवाद
महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने धोए थे अस्त्र
महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद पांडव अपने परिजनों और योद्धाओं की मृत्यु से उत्पन्न पापबोध से मुक्ति पाने के लिए विभिन्न तीर्थों पर गए थे। कपालमोचन में पहुंच कर उन्होंने अपने अस्त्र धोए और पितृ दोष से मुक्ति पाई थी। यहां उन्होंने पवित्र सरोवरों में स्नान किया और तपस्या कर आत्मिक शांति प्राप्त की। इसी कारण यह तीर्थ आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
सरोवर के बीच है महर्षि वेदव्यास का मंदिर
व्यासपुर का नाम महर्षि वेदव्यास के नाम पर पड़ा माना जाता है। गांव में स्थित प्राचीन सरोवर के मध्य महर्षि वेदव्यास का मंदिर श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास ने इसी क्षेत्र में तपस्या की थी और धर्म एवं ज्ञान के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। सरोवर के बीच स्थित मंदिर का दृश्य अत्यंत मनोहारी है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु महर्षि वेदव्यास को नमन कर ज्ञान, सद्बुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की कामना करते हैं। यह मंदिर व्यासपुर की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
भगवान शिव ने स्नान कर पाई थी कपाल दोष से मुक्ति
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव को ब्रह्मा के पांचवें सिर को काटने के कारण कपाल दोष लग गया था। ब्रह्महत्या के इस दोष से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव अनेक तीर्थों पर गए, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अंततः वे कपालमोचन पहुंचे और यहां स्थित पवित्र सरोवर में स्नान किया। मान्यता है कि स्नान के बाद उनके हाथ से ब्रह्मा का कपाल अलग हो गया और उन्हें दोष से मुक्ति मिली। इसी घटना के कारण इस तीर्थ का नाम कपालमोचन पड़ा। तब से यह स्थान पापों और दोषों से मुक्ति दिलाने वाला तीर्थ माना जाता है।
मानव कल्याण की मिलती प्रेरणा
डॉ. हर्षवीर शर्मा का कहना है कि व्यासपुर का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व अत्यंत गौरवशाली है। भगवान शिव, गुरु नानक देव, गुरु गोबिंद सिंह, गुरु रविदास और महर्षि वेदव्यास से जुड़ी मान्यताएं इस क्षेत्र की विशेष पहचान हैं। यह भूमि आध्यात्मिक चेतना, ज्ञान और मानव कल्याण की प्रेरणा प्रदान करती है।
संस्कृति व इतिहास का जीवंत प्रमाण
गांव के बलिंद्र कुमार का कहना है कि व्यासपुर की पावन धरती संतों, गुरुओं और ऋषि-मुनियों की तपस्थली रही है। यहां स्थित धार्मिक स्थल न केवल आस्था के केंद्र हैं, बल्कि हमारी समृद्ध संस्कृति और इतिहास के जीवंत प्रमाण भी हैं। यह क्षेत्र धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से भी अपार संभावनाएं रखता है।
सरोवरों में स्नान से मिलता है पुण्य
ग्राम पंचायत सदस्य संदीप कुमार का कहना है कि व्यासपुर की पहचान पूरे देश में धार्मिक आस्था के केंद्र के रूप में है। यहां हर वर्ष लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं और पवित्र सरोवरों में स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। यह क्षेत्र सामाजिक एकता, भाईचारे और धार्मिक सद्भाव का प्रतीक है।
धार्मिक विरासत हमारी अमूल्य धरोहर
समाजसेवी पंकुश खुराना का कहना है कि व्यासपुर और कपालमोचन क्षेत्र हमारी सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासत की अमूल्य धरोहर हैं। यहां विभिन्न धर्मों और परंपराओं से जुड़े ऐतिहासिक स्थल मौजूद हैं, जो भाईचारे और सामाजिक सद्भाव का संदेश देते हैं। इस क्षेत्र के संरक्षण और विकास के लिए सभी को मिलकर प्रयास करने चाहिए।
व्यासपुर। व्यासपुर केवल एक ऐतिहासिक गांव ही नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था का भी प्रमुख केंद्र है। व्यासपुर से लेकर तीर्थराज कपालमोचन तक का क्षेत्र सनातन, सिख और संत परंपरा की गौरवशाली विरासत को समेटे हुए है। मान्यता है कि इस पावन भूमि पर भगवान शिव, भगवान श्रीकृष्ण, महर्षि वेदव्यास, गुरु नानक देव, गुरु गोबिंद सिंह, गुरु रविदास तथा पांडवों सहित अनेक संत-महात्माओं ने अपने चरण रखे थे।
व्यासपुर और कपालमोचन क्षेत्र सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहां स्थित ऋणमोचन, कपालमोचन और सूरजकुंड सरोवरों में स्नान करने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। विशेष रूप से गुरु नानक देव जी के प्रकाशोत्सव पर आयोजित विशाल मेले में करीब 10 लाख श्रद्धालु भाग लेते हैं। श्रद्धालु गुरुद्वारा साहिब पहली व दसवीं पातशाही, गुरु रविदास मंदिर, गऊ बच्छा घाट और सूरजकुंड मंदिर में मत्था टेककर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कपालमोचन और ऋणमोचन सरोवर केवल आस्था के केंद्र ही नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक भी हैं। यहां विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग एक साथ आकर श्रद्धा व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि व्यासपुर क्षेत्र को धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से भी विशेष महत्व प्राप्त है।
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कपालमोचन स्थित गुरुद्वारा साहिब पहली व दसवीं पातशाही सिख श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र स्थल है। मान्यता है कि प्रथम सिख गुरु, श्री गुरु नानक देव जी यहां पहुंचे थे और उन्होंने लोगों को मानवता, सेवा और भाईचारे का संदेश दिया था। बाद में दशम पातशाह गुरु गोबिंद सिंह भी इस पावन स्थल पर आए और संगत को धर्म एवं राष्ट्र रक्षा के लिए प्रेरित किया। इसी कारण यह स्थान पहली और दसवीं पातशाही के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दोनों गुरुद्वारा साहिब एक ही परिसर में स्थित हैं।
संत शिरोमणि गुरु रविदास जी का भी व्यासपुर से गहरा संबंध है। गुरु रविदास जी पंजाब जाते हुए यहां पर ठहरे थे। उन्होंने यहां लोगों को समानता, प्रेम, मानवता और जाति-पाति से ऊपर उठकर जीवन जीने का संदेश दिया। कपालमोचन स्थित गुरु रविदास मंदिर इसी ऐतिहासिक स्मृति को संजोए हुए है। रोजाना बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंच कर गुरु रविदास जी को नमन करते हैं। इतना ही नहीं व्यासपुर के आंबेडकर नगर में भी वर्ष 1922 में श्री गुरु रविदास मंदिर की स्थापना हुई थी। मंदिर के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में अब इसका नवीनीकरण चल रहा है। संवाद
महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने धोए थे अस्त्र
महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद पांडव अपने परिजनों और योद्धाओं की मृत्यु से उत्पन्न पापबोध से मुक्ति पाने के लिए विभिन्न तीर्थों पर गए थे। कपालमोचन में पहुंच कर उन्होंने अपने अस्त्र धोए और पितृ दोष से मुक्ति पाई थी। यहां उन्होंने पवित्र सरोवरों में स्नान किया और तपस्या कर आत्मिक शांति प्राप्त की। इसी कारण यह तीर्थ आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
सरोवर के बीच है महर्षि वेदव्यास का मंदिर
व्यासपुर का नाम महर्षि वेदव्यास के नाम पर पड़ा माना जाता है। गांव में स्थित प्राचीन सरोवर के मध्य महर्षि वेदव्यास का मंदिर श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास ने इसी क्षेत्र में तपस्या की थी और धर्म एवं ज्ञान के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। सरोवर के बीच स्थित मंदिर का दृश्य अत्यंत मनोहारी है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु महर्षि वेदव्यास को नमन कर ज्ञान, सद्बुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की कामना करते हैं। यह मंदिर व्यासपुर की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
भगवान शिव ने स्नान कर पाई थी कपाल दोष से मुक्ति
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव को ब्रह्मा के पांचवें सिर को काटने के कारण कपाल दोष लग गया था। ब्रह्महत्या के इस दोष से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव अनेक तीर्थों पर गए, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अंततः वे कपालमोचन पहुंचे और यहां स्थित पवित्र सरोवर में स्नान किया। मान्यता है कि स्नान के बाद उनके हाथ से ब्रह्मा का कपाल अलग हो गया और उन्हें दोष से मुक्ति मिली। इसी घटना के कारण इस तीर्थ का नाम कपालमोचन पड़ा। तब से यह स्थान पापों और दोषों से मुक्ति दिलाने वाला तीर्थ माना जाता है।
मानव कल्याण की मिलती प्रेरणा
डॉ. हर्षवीर शर्मा का कहना है कि व्यासपुर का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व अत्यंत गौरवशाली है। भगवान शिव, गुरु नानक देव, गुरु गोबिंद सिंह, गुरु रविदास और महर्षि वेदव्यास से जुड़ी मान्यताएं इस क्षेत्र की विशेष पहचान हैं। यह भूमि आध्यात्मिक चेतना, ज्ञान और मानव कल्याण की प्रेरणा प्रदान करती है।
संस्कृति व इतिहास का जीवंत प्रमाण
गांव के बलिंद्र कुमार का कहना है कि व्यासपुर की पावन धरती संतों, गुरुओं और ऋषि-मुनियों की तपस्थली रही है। यहां स्थित धार्मिक स्थल न केवल आस्था के केंद्र हैं, बल्कि हमारी समृद्ध संस्कृति और इतिहास के जीवंत प्रमाण भी हैं। यह क्षेत्र धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से भी अपार संभावनाएं रखता है।
सरोवरों में स्नान से मिलता है पुण्य
ग्राम पंचायत सदस्य संदीप कुमार का कहना है कि व्यासपुर की पहचान पूरे देश में धार्मिक आस्था के केंद्र के रूप में है। यहां हर वर्ष लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं और पवित्र सरोवरों में स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। यह क्षेत्र सामाजिक एकता, भाईचारे और धार्मिक सद्भाव का प्रतीक है।
धार्मिक विरासत हमारी अमूल्य धरोहर
समाजसेवी पंकुश खुराना का कहना है कि व्यासपुर और कपालमोचन क्षेत्र हमारी सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासत की अमूल्य धरोहर हैं। यहां विभिन्न धर्मों और परंपराओं से जुड़े ऐतिहासिक स्थल मौजूद हैं, जो भाईचारे और सामाजिक सद्भाव का संदेश देते हैं। इस क्षेत्र के संरक्षण और विकास के लिए सभी को मिलकर प्रयास करने चाहिए।

डॉ. हर्षवीर शर्मा।

डॉ. हर्षवीर शर्मा।

डॉ. हर्षवीर शर्मा।

डॉ. हर्षवीर शर्मा।

डॉ. हर्षवीर शर्मा।

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