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Kangra News: घरेलू हिंसा की शिकार पत्नी-बेटी को हर महीने मिलेगा गुजारा भत्ता
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धर्मशाला। घरेलू हिंसा के मामले में जिला एवं सत्र न्यायालय धर्मशाला ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें पति को अपनी पत्नी और बेटी को हर महीने गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए गए थे। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-1 कांगड़ा राजेश चौहान की अदालत ने पति और ससुराल पक्ष की अपील को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पीड़ित महिला और उसकी मासूम बेटी भरण-पोषण की पूरी हकदार हैं।
यह मामला लंज की साधना द्वारा अपने पति सुशील कुमार और ससुराल पक्ष के खिलाफ दायर घरेलू हिंसा याचिका से जुड़ा है। महिला का आरोप था कि विवाह के बाद से ही उससे मायके से दहेज लाने की मांग की जा रही थी। मांग पूरी न होने पर उसे मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। बेटी के जन्म के बाद यह प्रताड़ना और बढ़ गई तथा वर्ष 2018 में उसे जबरन मायके छोड़ दिया गया। इसके बाद न तो पति उसे वापस लेने आया और न ही रहने-खाने के लिए कोई खर्च दिया।
निचली अदालत ने वर्ष 2022 में महिला के पक्ष में फैसला सुनाया था। अदालत ने पति को आदेश दिए थे कि वह पत्नी को 7,000 रुपये और बेटी को 1,500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण भत्ता दे। इसके साथ ही महिला को अलग आवास उपलब्ध करवाने अथवा उसके बदले 3,000 रुपये प्रतिमाह किराया देने के निर्देश भी जारी किए गए थे।
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इस फैसले को चुनौती देते हुए पति पक्ष ने सत्र अदालत में अपील दायर कर तर्क दिया कि उन्हें मामले की सही जानकारी नहीं दी गई और एकतरफा आदेश पारित हुआ। वहीं, महिला पक्ष ने बताया कि पति को नोटिस विधिवत भेजे गए थे, लेकिन वह जानबूझकर पेश नहीं हुआ। सत्र अदालत ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि पति को मामले की जानकारी थी और वह जानबूझकर अदालती प्रक्रिया से दूर रहा। कोर्ट ने अपील में फैसले को रद्द करने का कोई ठोस आधार न पाते हुए इसे खारिज कर दिया।
यह मामला लंज की साधना द्वारा अपने पति सुशील कुमार और ससुराल पक्ष के खिलाफ दायर घरेलू हिंसा याचिका से जुड़ा है। महिला का आरोप था कि विवाह के बाद से ही उससे मायके से दहेज लाने की मांग की जा रही थी। मांग पूरी न होने पर उसे मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। बेटी के जन्म के बाद यह प्रताड़ना और बढ़ गई तथा वर्ष 2018 में उसे जबरन मायके छोड़ दिया गया। इसके बाद न तो पति उसे वापस लेने आया और न ही रहने-खाने के लिए कोई खर्च दिया।
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निचली अदालत ने वर्ष 2022 में महिला के पक्ष में फैसला सुनाया था। अदालत ने पति को आदेश दिए थे कि वह पत्नी को 7,000 रुपये और बेटी को 1,500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण भत्ता दे। इसके साथ ही महिला को अलग आवास उपलब्ध करवाने अथवा उसके बदले 3,000 रुपये प्रतिमाह किराया देने के निर्देश भी जारी किए गए थे।
इस फैसले को चुनौती देते हुए पति पक्ष ने सत्र अदालत में अपील दायर कर तर्क दिया कि उन्हें मामले की सही जानकारी नहीं दी गई और एकतरफा आदेश पारित हुआ। वहीं, महिला पक्ष ने बताया कि पति को नोटिस विधिवत भेजे गए थे, लेकिन वह जानबूझकर पेश नहीं हुआ। सत्र अदालत ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि पति को मामले की जानकारी थी और वह जानबूझकर अदालती प्रक्रिया से दूर रहा। कोर्ट ने अपील में फैसले को रद्द करने का कोई ठोस आधार न पाते हुए इसे खारिज कर दिया।