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POCSO केस: नौ साल की बच्ची से यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी की अपील खारिज, गौहाटी हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखी

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवम गर्ग Updated Wed, 27 May 2026 04:21 PM IST
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सार

गौहाटी हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के एक अहम मामले में कहा है कि यौन उत्पीड़न साबित करने के लिए हाइमन फटना जरूरी नहीं है। अदालत ने आरोपी की 20 साल की सजा बरकरार रखी। 

POCSO Case: Gauhati High Court Upholds Conviction in Sexual Assault Case Involving 9-Year-Old Girl
गौहाटी उच्च न्यायालय - फोटो : एएनआई
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विस्तार

यौन अपराधों से जुड़े मामलों में मेडिकल रिपोर्ट और पीड़िता की गवाही को लेकर अक्सर अदालतों में लंबी बहस होती है। कई मामलों में यह सवाल उठता है कि यदि मेडिकल जांच में गंभीर चोट या हाइमन फटने के संकेत न मिलें तो क्या आरोपी को दोषी माना जा सकता है। इसी मुद्दे पर गौहाटी हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून में भेदक यौन उत्पीड़न साबित करने के लिए पूरा प्रवेश या हाइमन का टूटना जरूरी नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामूली स्तर का प्रवेश भी अपराध की श्रेणी में आता है। इसी के साथ हाईकोर्ट ने 9 वर्षीय बच्ची से यौन उत्पीड़न के आरोपी सतीश राय की अपील खारिज करते हुए उसे सुनाई गई 20 साल की कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा।



अदालत ने क्या कहा?
जस्टिस माइकल जोथनखुमा और जस्टिस संजीव कुमार शर्मा की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि पॉक्सो कानून की धारा 3 के तहत भेदक यौन उत्पीड़न का अर्थ केवल पूर्ण प्रवेश नहीं है। अदालत ने कहा कि अत्यंत मामूली प्रवेश भी इस अपराध की श्रेणी में आता है। पीठ ने कहा कि पीड़िता की उम्र केवल 9 वर्ष थी। ऐसे में यदि पूर्ण प्रवेश हुआ होता तो गंभीर शारीरिक चोट और हाइमन फटने की संभावना अधिक रहती। लेकिन सिर्फ हाइमन सुरक्षित होने के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि अपराध नहीं हुआ।
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मेडिकल रिपोर्ट में क्या सामने आया?
मामले में डॉक्टर की रिपोर्ट में पीड़िता का हाइमन सुरक्षित पाया गया था और हालिया यौन संबंध के स्पष्ट संकेत भी नहीं मिले थे। हालांकि मेडिकल जांच में हाइमन के आसपास लालिमा और छूने पर दर्द की पुष्टि हुई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि यह स्थिति मामूली स्तर के प्रवेश से भी हो सकती है। अदालत ने यह भी माना कि बचाव पक्ष डॉक्टर से इस पहलू पर कोई ठोस सवाल नहीं कर सका।
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आरोपी की दलील क्यों खारिज हुई?
आरोपी पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि बच्ची ने मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए धारा 164 के बयान में केवल गलत काम शब्द का इस्तेमाल किया था, जिससे यौन संबंध साबित नहीं होता। लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता ने ट्रायल के दौरान साफ तौर पर बताया कि आरोपी ने अपना निजी अंग उसके प्राइवेट पार्टी में डाला था। इसलिए केवल शब्दों के अलग इस्तेमाल से उसकी गवाही पर संदेह नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि डॉक्टर की रिपोर्ट हालिया यौन संबंध को स्पष्ट रूप से साबित नहीं करती, लेकिन पीड़िता की गवाही से यह साबित होता है कि आरोपी ने मामूली स्तर पर प्रवेश किया था। इसी आधार पर अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया और आरोपी की अपील खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
गुवाहाटी हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि हाइमन का सुरक्षित होना दुष्कर्म न होने का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि पीड़िता की गवाही पूरी तरह भरोसेमंद है और उससे यह स्पष्ट साबित होता है कि आरोपी ने बच्ची के साथ भेदक यौन उत्पीड़न किया। इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 20 साल की सजा को सही ठहराया गया। 

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