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डॉ. दिनेश त्रिपाठी: हर नौकरी पे भारी है सरकारी नौकरी

कविता
                
                                                         
                            लगती सभी को प्यारी है सरकारी नौकरी ,
                                                                 
                            
हर नौकरी पे भारी है सरकारी नौकरी ।

नौकर भी अपने आप को मालिक समझ रहा ,
ऐसी ग़ज़ब खुमारी है सरकारी नौकरी ।

तनख्वाह तो मिलेगी भले काम हो न हो ,
इस तरह चमत्कारी है सरकारी नौकरी ।

नेता हैं एक ओर तो अफ़सर हैं एक ओर ,
दोनो तरफ़ कटारी है सरकारी नौकरी ।

दूल्हे का भाव छूने लगा आसमान को ,
लाती दहेज़ भारी है सरकारी नौकरी ।

इंसाफ़ फाइलों में दफ़्न होके रह गया ,
इंसाफ़ की सुपारी है सरकारी नौकरी ।

है एक जो अनार तो लाखों मरीज़ हैं ,
दुर्लभ दवा ये न्यारी है सरकारी नौकरी ।

अफ़सर से ले के प्यून तक सब दुह रहे इसे ,
ये गाय इक दुधारी है सरकारी नौकरी ।

चुटकी में जिसने सारा बजट लुप्त कर दिया ,
सिस्टम की इक मदारी है सरकारी नौकरी ।

ईमान का है साथ दिया जिसने यहां पर ,
उसके लिए कटारी है सरकारी नौकरी ।

शायर का मशवरा है जिसे भूलना नहीं ,
जनता की तरफ़दारी है सरकारी नौकरी ।

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3 hours ago

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