अंतर्द्वंद्व में मन और कलम
प्यार लिखूं या आभार लिखूं
कागज़ और कलम के बीच
उलझे पड़े हैं कितने ही भाव
शब्दों की भीड़ में खोया सा खड़ा
कलम की नोक पर हर जज़्बा अधूरा पड़ा
दिल कहता है लिख दे वो सारी कहानी
दिमाग़ कहता है रुक, क्या है इतनी जल्दबाजी
प्यार लिखूं तो स्याही अलग ही इश्क़ में डूब जाए,
हर अक्षर में बस उनका ही नाम गूंज जाए
और आभार लिखूं तो आंखें भीग जाए
कुछ खास लम्हें सामने से गुजर जाए
कलम पूछती है अक्सर किसका हक़ पहले
उस एहसास का जो रूह तक उतर गया,
या उस एहसान का
जिसने फिसलने से रोक लिया
और अंत में निर्णय यह हुआ
क्यों बांटे इन्हें दो नामों में
नाम के रिश्ते तो भरे पड़े हैं इस ज़माने में
इसलिए रहने दें एक रिश्ते को यूंही बेनाम।
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