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ग्राउंड रिपोर्ट: अलीगढ़ मंडल में ध्रुवीकरण बनाम जातीय समीकरण, विपक्ष के सामने चक्रव्यूह तोड़ने की चुनौती

अभिषेक शर्मा, अमर उजाला, अलीगढ़ Published by: ishwar ashish Updated Mon, 13 Dec 2021 10:07 AM IST
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सार

अलीगढ़ मंडल में ध्रुवीकरण बनाम जातीय समीकरण की लड़ाई है। भाजपा के सामने 2017 में मिली प्रचंड जीत दोहराने की चुनौती है तो विपक्ष के सामने भाजपाई चक्रव्यूह तोड़ना एक चुनौती है।

Ground report of Aligarh Mandal by Abhishek Sharma.
राजा महेंद्र प्रताप विश्वविद्यालय का निर्माण स्थल और मॉडल चित्र। - फोटो : amar ujala
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विस्तार

गंगा-यमुना के दोआब पर बसे और विविधताओं को समेटे अलीगढ़ मंडल की अपनी एक सियासी तासीर है। इस मंडल के राजनेताओं और यहां की सियासत का प्रदेश में अपना मुकाम रहा है। विधानसभा की 17 सीटों वाले इस मंडल में कृषि कानून, महंगाई, बेरोजगारी, आधा-अधूरा विकास, लचर स्वास्थ्य सेवाओं सरीखे मुद्दों के बीच हर सीट का अपना-अपना सियासी मिजाज है। कहीं धार्मिक ध्रुवीकरण, कहीं जातीय समीकरण, तो कहीं कृषि कानून से उपजी नाराजगी अपना असर दिखाएगी।


इस सबके बीच 2017 के चुनाव में बसपा-सपा और रालोद को झटका देकर 17 में से 16 सीटें जीतने वाली सत्तारूढ़ भाजपा के लिए प्रचंड जीत को बरकरार रखना बड़ी चुनौती है। वहीं, विपक्षियों के लिए भाजपा का प्रचंड चक्रव्यूह तोड़ना और भी बड़ी चुनौती है। हालांकि भगवा खेमा मंडल में कराए गए विकास कार्यों के दम पर तो विपक्ष स्थानीय मुद्दों और जनप्रतिनिधियों के प्रति उपजी नाराजगी के सहारे नैया पार लगाने की पुरजोर कोशिश में हैं।
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अलीगढ़ की शहरी सीटों पर धार्मिक ध्रुवीकरण के दम पर लड़ाई सीधे भाजपा बनाम विपक्ष होती रही है। देहात के जाटलैंड की दो सीटें इगलास और खैर उम्मीदवार के चेहरे, मुद्दे और जातीय समीकरण पर, क्षत्रिय बहुल दो सीटें बरौली और छर्रा भी चेहरे और दल पर, जबकि अतरौली सीट कल्याण सिंह के परिवार के नाम पर जीती जाती है। मंडल में 2012 में अलीगढ़ की 7 में से 4 पर सपा का व 3 पर रालोद का कब्जा था। मगर 2017 में पहली बार सातों सीटें भाजपा ने मोदी लहर और वोटों के ध्रुवीकरण के सहारे जीत लीं।
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इसी तरह 2012 में हाथरस की 3 में से 2 सीटें बसपा व 1 सपा की झोली में थीं, लेकिन 2017 में तीन में से दो सीटें भाजपा ने जीतीं और एक सीट बचाने में बसपा कामयाब रही। 2012 में एटा-कासगंज की 7 सीटों में से 6 सपा ने जीती थीं तो 1 बसपा की झोली में थी, इनमें से सभी सीटें भाजपा ने 2017 में जीत लीं। मंडल में पिछले करीब दो दशक से कल्याण सिंह की पारिवारिक सीट अतरौली और अलीगढ़ शहर सीट को छोड़ दें, तो बाकी सभी पर सपा व बसपा के बीच टकराव होता रहा है। अतरौली और अलीगढ़ शहर में भाजपा मुख्य लड़ाई में रही है।

स्थानीय चेहरों पर नाराजगी बन सकती है चुनौती

बात मुद्दों की करें तो अलीगढ़ में शहरी सीटों पर ध्रुवीकरण और जातीय समीकरण के साथ-साथ महंगाई भी इस बार मुद्दा बन सकती है। जिस तरह से व्यापारी और आम शहरी महंगाई के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, उससे यह आसार बन रहे हैं। इसी तरह जाटलैंड में कृषि कानून और स्थानीय चेहरों पर उपजी नाराजगी भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन सकती है। इसका परिणाम हाल ही के जिला पंचायत चुनाव में भी देखने को मिला था। हालांकि दिग्गज जाट नेता राजा महेंद्र प्रताप के नाम से राज्य स्तरीय विश्वविद्यालय बनाने की घोषणा कर जाटों की नाराजगी दूर करने का प्रयास किया गया है। मगर यह कितना कारगर होगा, यह समय बताएगा।

जातीय समीकरण भी लेंगे इम्तिहान
छर्रा और बरौली सीट पर जातीय समीकरण और एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर भाजपा के लिए चुनौती हो सकती है। वहीं, अतरौली सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के निधन के बाद उनकी परंपरागत सीट को बचाए रखना भी प्रतिष्ठा का सवाल है। इसी तरह हाथरस में हाथरस सदर व सिकंदराराऊ सीट पर   जातिगत समीकरण, चेहरों से नाराजगी बड़े विषय हैं, जबकि सादाबाद में पूर्व मंत्री  रामवीर उपाध्याय का सियासी कदम, जाटों में नाराजगी इस सीट का भविष्य तय करेगी। कासगंज में भाजपा की तीनों सीटों पर जातीय समीकरण, विकास के मुद्दे और एटा की   चार सीटों पर जातीय समीकरण व विकास   के मुद्दे प्रमुख विषय हैं।

राजा के सहारे पश्चिम के जाटों में सेंधमारी का किया प्रयास
पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ ने जाटों के बड़े नेता राजा महेंद्र प्रताप के नाम पर अलीगढ़ में राज्य विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा की। इसके पीछे कई बड़े कारण निकाले जा रहे हैं। पहला, अलीगढ़ में मुस्लिम विश्वविद्यालय के सामने एक बड़ा विश्वविद्यालय स्थापित कर ध्रुवीकरण का प्रयास किया गया है। दूसरा, पश्चिम के जाटों को साधने की कोशिश। हालांकि इसके परिणाम आने वाले समय में सामने आएंगे।

गन्ना और छुट्टा पशु बड़े मुद्दे
अलीगढ़ में क्षत्रिय महासभा के जिलाध्यक्ष और कृषि विषयों पर गहरी पकड़ रखने वाले ठा. शैलेंद्रपाल सिंह कहते हैं, कृषि कानूनों को लेकर उपजी नाराजगी से पहले भी यहां दो ऐसे बड़े विषय हैं, जिन पर सरकार से कोई लाभ नहीं मिला है। इनमें जिले की एकमात्र सहकारी साथा चीनी मिल का पुनरुद्धार नहीं होना बड़ी समस्या है।

इसके चलते अपने जिले के गन्ना किसानों को साबितगढ़ मिल के भरोसे रहना पड़ता है। साथा मिल से किसानों को बकाया तक नहीं मिला है। इसी तरह जिले में छुट्टा पशुओं से फसलों को हो रहा नुकसान भी बड़ा मुद्दा है। इन दोनों विषयों पर जिले के किसान लगातार आंदोलनरत हैं। इसी तरह आलू बेल्ट इगलास, गोंडा में आलू उत्पादक किसानों की सहूलियतों का भी कोई ध्यान पिछली सरकारों की तरह इस सरकार ने भी नहीं रखा है।

राज्य विश्वविद्यालय, स्मार्ट सिटी परियोजना बड़ी उपलब्धि, पर नहीं सुधरी यातायात व्यवस्था

अलीगढ़ के ही गांव लोधा के प्रधान शीलू ठाकुर जिले में बनाए जा रहे राज्य विश्वविद्यालय को भाजपा शासन में मिली बड़ी सौगात मानते हैं। वे कहते हैं कि इसका लाभ आने वाले चुनाव में भाजपा को मिलेगा। वहीं, व्यापारी व सेंटर प्वॉइंट व्यापार मंडल के अध्यक्ष विवेक बगई स्मार्ट सिटी परियोजना को बड़ी उपलब्धि मानते हैं। मगर शहर में यातायात व्यवस्था में सुधार नहीं होना भी बड़ी समस्या है। कारोबारी सौन्य कपिल शर्मा कोरोना के बाद जिले की पहचान ताला व हार्डवेयर उद्योग को उबारने के लिए बड़ी मदद नहीं मिलने को भी बड़ी समस्या बताते हैं।

हाथरस के कारोबार को नहीं मिल पाई पहचान
हाथरस के रेडीमेड कारोबारी राजेश अग्रवाल कहते हैं, विकास कार्य तो हो रहे हैं। मगर हाथरस के मूल कारोबार हींग, रंग व रेडीमेड को पहचान मिले, ऐसा कोई काम नहीं हुआ। वे ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी की जरूरत बताते हैं। इसी तरह आढ़ती पवन वार्ष्णेय भी ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी की कमी को बड़ी समस्या बताते हैं।

मेडिकल कॉलेज मिला, पर विकास से बहुत दूर हैं एटा-कासगंज
एटा के वरिष्ठ अधिवक्ता आदेश कुमार सक्सेना कहते हैं, बेशक मेडिकल कॉलेज की स्थापना कर सरकार ने जिले को सौगात देने का प्रयास किया, मगर अभी हमारा जिला विकास से कोसों दूर है। रोजगार के नाम पर कुछ नहीं है। बेरोजगार हमेशा पलायन को मजबूर होता है। इसी तरह कासगंज के अधिवक्ता सत्येंद्रपाल सिंह यहां की स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल खड़ा करते हैं। वह कहते हैं, जिला मुख्यालय बनने के बाद भी सामान्य मरीज को भी मंडल मुख्यालय रेफर किया जाता है। कोरोना में भी हाल बेहाल रहा। इसी तरह व्यापारी शशिकांत गर्ग कहते हैं, सिर्फ सोरों को सूकर तीर्थस्थल क्षेत्र घोषित किया गया। व्यापारियों के लिए भी कुछ नहीं मिला है।

ये हैं प्रमुख मुद्दे

- आलू उत्पादक किसानों के लिए बड़ी इंडस्ट्री की मांग
- छुट्टा जानवरों से फसलों को होने वाले नुकसान से गुस्सा
- हाथरस, एटा, कासगंज में रोजगार के बड़े उद्यम सृजित     न हो पाना
- साथा चीनी मिल का पुनरुद्धार न हो पाना
- महंगाई और चेहरों से नाराजगी के सवालों पर कोई जवाब न होना

पांच प्रमुख काम
- अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप के नाम से राज्य स्तरीय विश्वविद्यालय बन रहा है
- डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की स्थापना और उद्यम लगाने   की तैयारी
- एटा जनपद में राज्य स्तरीय मेडिकल कॉलेज की स्थापना की गई
- हाथरस में तालाब चौराहे पर ओवरब्रिज का निर्माण पूरा कराया गया
- कासगंज के प्रमुख सोरों सूकर क्षेत्र को तीर्थस्थल घोषित किया गया

क्या गुल खिलाएंगे रामवीर व जयवीर
बसपा के शासनकाल में कद्दावर मंत्री रहे हाथरस के दिग्गज ब्राह्मण नेता रामवीर उपाध्याय का जिले की सियासत पर दबदबा है। 2017 में सादाबाद सीट से जीते उपाध्याय फिलहाल बसपा से निलंबित हैं। पर, उनकी पत्नी, पुत्र व भाइयों ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर रखी है। भाजपा के समर्थन से उनकी पत्नी जिला पंचायत अध्यक्ष भी निर्वाचित हुई हैं। माना जा रहा है कि रामवीर या उनका पुत्र चिरागवीर सादाबाद से भाजपा के प्रबल दावेदार हो सकते हैं। चूंकि सादाबाद जाट बहुल क्षेत्र है और रालोद का यहां प्रभाव है, इस दृष्टि से अगर रामवीर या उनके परिवार का कोई सदस्य लड़ता है तो उनके सामने रालोद-सपा गठबंधन कड़ी चुनौती होगा।

बसपा के कद्दावर नेताओं में शुमार रहे क्षत्रिय नेता जयवीर सिंह का अलीगढ़ की राजनीति में गहरा प्रभाव है। वे भाजपा से एमएलसी हैं और अपनी परंपरागत बरौली विधानसभा सीट से प्रबल दावेदार भी हैं। इसी सीट पर उनके परस्पर विरोधी और पार्टी के मौजूदा विधायक ठा. दलवीर सिंह का दावा भी मजबूत है। ऐसे में अगर किसी एक को टिकट मिलता है तो दूसरे के नाराज होने की आशंका है। जयवीर सिंह के राजनीतिक कद को देखते हुए भाजपा उनकी नाराजगी शायद किसी कीमत पर नहीं लेना चाहेगी। ऐसे में यह भी माना जा रहा है कि या तो बरौली से या फिर आसपास की किसी अन्य क्षत्रिय बहुल सीट से उन्हें टिकट दिया जा सकता है।

सीटों का समीकरण: अलीगढ़ (सात सीटें)

खैर (सु.) : भाजपा के अनूप प्रधान विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : जाट करीब 1.10 लाख, ब्राह्मण 50 हजार, जाटव 40 हजार, अन्य अनुसूचित जातियां 25 हजार, मुस्लिम 30 हजार, वैश्य 25 हजार।

बरौली : भाजपा के दलवीर सिंह विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : क्षत्रिय करीब 90 हजार, ब्राह्मण व मुस्लिम 35-35 हजार, जाटव 30 हजार, लोध, बघेल व जाट 25-25 हजार।

अतरौली : भाजपा के संदीप सिंह विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : यादव व लोध करीब75-75 हजार, ब्राह्मण 35 हजार, जाट व मुस्लिम 30-30 हजार, जाटव 25 हजार।

छर्रा : भाजपा के रवेंद्र पाल सिंह विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : क्षत्रिय करीब 80 हजार, मुस्लिम 35 हजार, यादव व जाटव 30-30 हजार, लोधी 25 हजार, ब्राह्मण 20 हजार।

कोल : भाजपा के अनिल पाराशर विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 1.45 लाख, ब्राह्मण 60 हजार, क्षत्रिय 50 हजार, वैश्य 35 हजार, जाटव 30 हजार, लोध 20 हजार।

अलीगढ़ शहर : भाजपा के संजीव राजा विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : वैश्य व मुस्लिम करीब 1.40-1.40 लाख, कोली 40 हजार, ब्राह्मण 30 हजार।

इगलास (सु.) : भाजपा के राजकुमार विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : जाट करीब 1 लाख, ब्राह्मण 80 हजार, अनुसूचित जातियां 50 हजार, बघेल 30 हजार, वैश्य 20 हजार।

एटा (4 सीटें)
एटा सदर : भाजपा के विपिन वर्मा डेविड विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : यादव करीब 65 हजार, वैश्य व अनुसचित जातियां 45-45 हजार, लोधी 35 हजार, ब्राह्मण 30 हजार, क्षत्रिय व मुस्लिम 20-20 हजार।

अलीगंज : भाजपा के सत्यपाल सिंह राठौर विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : यादव करीब 65 हजार, क्षत्रिय 55 हजार, अनुसूचित जातियां 50 हजार, शाक्य 40 हजार, मुस्लिम 30 हजार, ब्राह्मण 25 हजार, लोधी 18 हजार, वैश्य 16 हजार।

मारहरा : भाजपा के वीरेंद्र सिंह लोधी विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : लोधी करीब 65 हजार, यादव व अनुसूचित जातियां 55-55 हजार, क्षत्रिय 21 हजार, ब्राह्मण 20 हजार, मुस्लिम 13 हजार, वैश्य 11 हजार।

जलेसर (सु.): भाजपा के संजीव दिवाकर विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : यादव व अनुसूचित जातियां करीब 70-70 हजार, क्षत्रिय 37 हजार, मुस्लिम 30 हजार, लोधी 25 हजार, बघेल 23 हजार, वैश्य 13 हजार।

कासगंज (3 सीटें)
कासगंज सदर : भाजपा के देवेंद्र राजपूत विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : लोधी करीब 70 हजार, अनुसूचित जातियां 47 हजार, यादव 40 हजार, मुस्लिम 35 हजार, वैश्य 30 हजार, बघेल 22 हजार, क्षत्रिय व शाक्य 20-20 हजार, ब्राह्मण 17 हजार।

पटियाली : भाजपा के ममतेश शाक्य विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : मुस्लिम करीब 50 हजार, यादव व अनुसूचित जातियां 45-45 हजार, क्षत्रिय 40 हजार, शाक्य-बघेल 35-35 हजार।

अमांपुर : भाजपा के देवेंद्र प्रताप सिंह जीते थे। उनकी मौत के बाद से सीट रिक्त है।
जातिगत समीकरण : लोधी करीब 60 हजार, क्षत्रिय व अनुसूचित जातियां 40-40 हजार, मुस्लिम 38 हजार, शाक्य 30 हजार, ब्राह्मण 25 हजार, बघेल 20 हजार,            वैश्य 15 हजार, यादव 7 हजार।

हाथरस (3 सीटें)
सिकंदराराऊ : भाजपा के वीरेंद्र सिंह राणा विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : क्षत्रिय करीब 90 हजार, अनुसूचित जातियां 60 हजार, यादव 40 हजार, बघेल व मुसलमान 35-35 हजार, वैश्य 20 हजार, अहेरिया 15 हजार, कुशवाह व लोधी 12-12 हजार, कुम्हार 10 हजार।

सादाबाद : रामवीर उपाध्याय बसपा से जीते थे। अब पार्टी से निलंबित।
जातिगत समीकरण : जाट करीब 90 हजार, अनुसूचित जातियां 55 हजार, ब्राह्मण 50 हजार, मंसलमान 25 हजार, क्षत्रिय व बघेल 20-20 हजार, वैश्य व यादव 15-15 हजार।

हाथरस (सु.) भाजपा के हरिशंकर माहोर विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : अनुसूचित जातियां करीब 80 हजार, ब्राह्मण 45 हजार, वैश्य 40 हजार, क्षत्रिय 35 हजार, मुस्लिम व कुशवाह 25-25 हजार, बघेल व जाट 15-15 हजार।

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