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आधी आबादी ने मांगा हक : महिला संगठनों ने राजनेताओं के प्रयास पर उठाए सवाल

न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ Published by: Amulya Rastogi Updated Sun, 07 Apr 2019 12:22 AM IST
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women ask their right, female organisation raise questions over politicians
सांकेतिक तस्वीर
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महिला अधिकारों के लिए लड़ रहे संगठनों ने आधी आबादी की बेहतरी के लिए सरकार के प्रयासों पर प्रश्न चिह्न लगाया है। उनका मानना है कि महिलाओं को हक तभी मिलेगा, जब उनका अपना घोषणा पत्र होगा। इन संगठनों ने बेटी-बचाओ बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम को पूरी तरह विफल बताया। उनका कहना है कि सरकारी पोस्टरों में कार्यक्रम के प्रचार की जगह नेताओं का प्रचार अधिक किया जा रहा है।


महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली समाजसेवी डॉ. रूपरेखा वर्मा ने ‘अमर उजाला’ को बताया कि आधी आबादी को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए एक साझा मंच बनाकर ‘बदलाव के लिए यात्रा’ के माध्यम से अपनी आवाज उठाई थी। 
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इसमें विभिन्न वर्ग की महिलाएं, ट्रांसजेंडर, सामाजिक कार्यकर्ता, दलित, आदिवासी, छात्र, मजदूर और किसान शामिल थे। इस दौरान कहा गया था कि लगभग 50 फीसदी महिलाओं को केंद्र या राज्य स्तर पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है। 16वीं लोकसभा में केवल 12 फीसदी महिलाएं थी। 
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भारत निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार देश भर में कुल 4,896 सांसदों व विधायकों में महज नौ फीसदी महिलाएं हैं। जबकि एक संसदीय अध्ययन में महिलाओं के लिए सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय के बारे में किसी भी प्रभावी नीति के लिए न्यूनतम 33 फीसदी प्रतिनिधित्व की सिफारिश की गई है। 

महिला संगठनों ने चिंता जताई है कि महिलाओं को किसानों के रूप में मान्यता नहीं है। जबकि 65.1 फीसदी महिला कृषि पर ही निर्भर है। खेती में अधिकांश महिलाएं दलित और आदिवासी समुदाय से हैं। महिलाओं के लिए कृषि बजट आवंटन का 8.5 फीसदी है। इससे महिला किसानों के लिए चिंता न होना साफ दिखता है। इन पर भी सरकार को ध्यान देना होगा।
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