बेटियों को लेकर समाज की संगदिली खत्म नहीं हो रही। एक बिटिया को कोई अपना पैदा होते ही गुटखे के झोले में रखकर फेंक गया था। जब थैला खुला तो वह 12 घंटे की मासूम पूरी तरह नीली पड़ चुकी थी। एनआईसीयू में वह ऑक्सीजन सपोर्ट पर है। अस्पताल मे चिकित्सा अधीक्षक एमएल भार्गव ने बताया कि बच्ची फिलहाल ठीक है। हालांकि, शनिवार रात उसने दूध नहीं पिया है, इसलिए उसकी सेहत के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है। वैसे यह सामान्य प्रसव था, उसका वजन 2.6 किलो है। सेहत में सुधार आने पर ऑक्सीजन मॉस्क हटाया जाएगा और कोशिश की जाएगी कि वह फीडिंग कर सके।
गुटखे के झोले में भरकर फेंक दिया 12 घंटे की मासूम को, थैला खुला तो नीली पड़ चुकी थी...
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दुखद : पूछिए उनसे जिनके संतान नहीं, फूल सी बच्ची को फेंक दिया गया
मुकेश ग्राम विकास के पूर्व प्रमुख सचिव दीपक त्रिवेदी के ड्राइवर रहे हैं। वह कहते हैं कि क्या मालूम था की थैले में बच्ची है। यदि थैला न हिला होता और बच्ची न रोई होती तो पता भी नहीं चलता। वह कहते हैं कि मेरे एक मित्र के संतान नहीं, वह तड़पते हैं औलाद के लिए। जरा सोचिए, कितना दुखद होता है बच्चा न होना। ऐसे में पता नहीं कौन संगदिल मासूम को फेंक गया।
चिंतनीय हालात : हजार के अनुपात में 870 ही रह गई
लखनऊ में बेटियों के जन्म को लेकर नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे - 4 के ताजा आंकड़ों का दावा है कि बीते पांच साल में बाल लैंगिक अनुपात 870 पर आ चुका है। हर हजार लड़कों के जन्म के अनुपात में 870 ही लड़कियां जन्म ले रही हैं। जनगणना 2011 में छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों में जेंडर रेशो 915 था। यानी हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं।
अदब के शहर का कड़वा सच, ज्यादातर फेंकी जा रही बच्चियां
लावारिस छोड़े जा रहे नवजात में लखनऊ में तीन-चौथाई बेटियां हैं। चालल्ड लाइन लखनऊ और रेलवे चाइल्ड लाइन के पास दर्ज आंकड़ों के अनुसार बीते पांच 54 नवजात लावारिस मिले। इनमें 39 लड़कियां थीं। यह केवल दर्ज आंकड़े, बिना दर्ज हुए मामले और कन्या भ्रूण मिलने की घटनाएं इससे कई गुना अधिक है।
साल : बालक - बालिका
2013 : 03 - 10
2014 : 06 - 10
2015 : 03 - 06
2016 : 02 - 10
2017 : 02 - 05
आंकडे़ : सात अक्तूबर 2017 तक
फिलहाल राजकीय बाल गृह में मिलेगा आश्रय, फिर तय होगा भविष्य
पुलिस ने चाइल्ड लाइन को भी सूचित कर दिया था। चाइल्ड लाइन लखनऊ के समन्वयक अजीत कुशवाहा ने बताया कि बाल कल्याण समिति ने बच्ची को प्रागनारायण रोड स्थित राजकीय बाल गृह शिशु को सौंपने के आदेश दिए हैं। अस्पताल से स्वस्थ होने के बाद उसे यहां लाया जाएगा और गोद देने की की प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा।
संगदिल समाज से बड़ा सवाल : आखिर कब समझोगे बेटियों का महत्व
बेटियां हमारा मान हैं, हमारा सम्मान हैं। मां-बेटी, पत्नी, बहन, मित्र और न जाने कितनी जिम्मेदारियां निभा रही है। दुनिया भर में अपने समाज, माता-पिता और देश का नाम रोशन कर रही है। हर मोर्चे पर खुद को साबित कर रही,अव्वल आ रही। दुनिया उनका लोहा मान रही, फिर भी उन्हें कभी पैदा होने से पहले तो कभी पैदा होते ही यूं मरने के लिए छोड़ देना....। आखिर कब तक? यह सिर्फ शर्मसार करने वाली घटना ही नहीं बल्कि यह एक कायरना करतूत भी है। ऐसा करने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की जरूरत, आखिर कब समझी जाएगी।