=डबवाली (सिरसा)। डाक्टरों के पैनल ने उस बच्चे में ‘लो आई क्यू’ की स्थिति बताते हुए उसे मंदबुद्धि करार दे दिया था। स्वास्थ्य रिपोर्ट कार्ड देखकर मां-बाप भी हिम्मत हार गए। लेकिन उस बच्चे को पाठशाला में मिला जीने का मंत्र। मात्र दो साल में ही उस बच्चे ने सिर्फ अपना ही नहीं अपने मां-बाप का नाम भी रोशन कर दिखाया। गांव चकरुलदू सिंह वाला का 12 वर्षीय मनप्रीत ने विशेष ओलंपिक खेलों में दो साल के दौरान आठ पदक जीते हैं। मनप्रीत के इस प्रतिभा ने उसके प्रति मां-बाप की सोच में भी बदलाव ला दिया है। मां-बाप जोकि मनप्रीत को स्कूल के हटाकर काम-धंधे में लगाने की सोच रहे थे लेकिन वे अब उसे पढ़ाना चाहते हैं।
गांव चकरुलदू सिंह वाला निवासी जगसीर सिंह का 12 वर्षीय पुत्र मनप्रीत की अक्तूबर 2010 में चिकित्सीय बोर्ड ने जांच करके उसे मंदबुद्धि करार दे दिया था। मनप्रीत शारीरिक रूप से बिल्कुल फिट था। फिर भी, पढ़ाई में कमजोर होने और डाक्टरों की रिपोर्ट के बाद मां-बाप ने मनप्रीत को स्कूल से हटाकर काम धंधे पर लगाने का फैसला किया लेकिन स्पेशल टीचर मुकेश और सर्वशिक्षा अभियान की वालंटियर छिंद्रपाल कौर ने मनप्रीत को स्कूल से हटने नहीं दिया। अध्यापकों ने अपनी जिम्मेदारी पर मनप्रीत को खंड स्तरीय खेल प्रतियोगिता में उतारा, तो सब लोग हैरान रह गए। मनप्रीत को खंड स्तर पर सर्वश्रेष्ठ धावक का खिताब मिला। इसके बाद जिला स्तर पर भी उसने यह मुकाम बनाए रखा।
इसके बाद बारी आई, स्पेशन ओलंपिक भारत (पंजाब चैप्टर) में चयन परीक्षा की। मनप्रीत के मानसिक स्तर को देखते हुए पिता जगसीर और मां जसवीर कौर उसे प्रतियोगिता में भेजनेको तैयार नहीं हुए। यहां भी अध्यापकों ने फिर जिम्मेदारी ली और मनप्रीत को संगरूर लेकर गए। पिछले साल तीन से पंाच नवंबर तक वार हीरोज मैमोरियल स्टेडियम संगरूर में आयोजित हुए ओलपिंक की 200 मीटर दौड़ में मनप्रीत ने स्वर्ण और 100 मीटर में रजत पदक जीता। मनप्रीत बीते दो सालों के दौरान आठ पदक जीत चुका है।
बदला अभिभावकों का नजरिया
बेटे को ओलंपिक में स्वर्ण और रजत जीतता देख जगसीर और जसवीर कौर की सोच में भी बदलाव आ गया है। जगसीर सिंह ने बताया कि वह दिहाड़ीदार मजदूर है। उसके दो बेटे हैं। 15 वर्षीय खुशदीप और 12 वर्षीय मनप्रीत। मनप्रीत उनका नाम रोशन करेगा, उन्हें इसकी कल्पना भी नहीं की थी। इसी लिए अब उन्होंने मनप्रीत की पढ़ाई जारी रखी है। वह कक्षा छह में पढ़ रहा है। जब भी प्रतियोगिता आती है तो वे अपने बच्चे का हौसला बढ़ाने के लिए खुद उसके साथ जाते हैं।
हीनभावना सफलता में सबसे बड़ी बाधा
सरकारी अस्पताल डबवाली के एसएमओ एमके भादू ने कहा कि विशेष बच्चों पर उसके इर्दगिर्द के वातावरण का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। वातावरण के कारण ही उनमें हीनभावना आ जाती है। ऐसी भावना को दूर करके उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है। उपरोक्त मामले में भी ऐसा ही हुआ है। मेडिकल बोर्ड ने मनप्रीत को मानसिक रूप से अयोग्य घोषित किया लेकिन अध्यापकों ने उसके अंदर छुपी प्रतिभा को बाहर निकाला, जिसकी बदौलत वह आज शानदार प्रदर्शन कर रहा है। भादू के अनुसार, अक्सर विशेष बच्चों का शारीरिक विकास सामान्य बच्चों के शारीरिक विकास के समान ही होता है लेकिन घर में मिले वातावरण से बच्चे टूट जाते हैं। अगर मां-बाप ऐसे बच्चों को दूसरे बच्चों की तरह लगाव करें, तो बेहतर परिणाम निकलते हैं।