चंबा। विश्व के प्राचीनतम जिलों में शुमार जिला चंबा में कई पौराणिक गाथाएं आज भी प्रचलित हैं। इसमें से शिव पूजन या शिव नवाला भी एक है। कहा जाता है कि चौरासी सिद्धों ने यहां भगवान शिव की तंत्रोक्त पूजा आरंभ की, जिसे शिव नवाला नाम दिया गया। इसमें जागरण होता है, जो गृह प्रवेश शादी विवाह से पहले और किसी भी धार्मिक आस्था व शुभ काम के पूर्व किया जाता है। इसमें नौ लोगोें का होना आवश्यक होता है। इनमें घरमोहिया यानी आयोजक, एक जोगी, चार ऐंचल गायक, एक चेला, एक कटवाल व एक बटवाल होते हैं। इस कारण इसे स्थानीयभाषा में नौ मणुआ नवाला भी कहा जाता है। वरिष्ठ साहित्यकार कमल प्रसाद शर्मा ने बताया कि इस पूजा को गूढ संस्कार एवं मोक्षदायिक माना गया है। उन्होंने बताया कि जीवन की प्रत्येक उपलब्धि को शिव का वरदान मान कर उसमें अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए नवाले का आयोजन किया जाता है। साहित्यकार डा. राजेश सहगल ने बताया कि इस पूजा का आयोजन शुभ स्थान एवं घड़ी अथवा योग पर किया जाता है। उन्होंने बताया कि शिवरात्रि व श्रावण मास का पूरा महीना इस अनुष्ठान के लिए पवित्र माना जाता है। साथ ही कार्तिक व चैत्र माह में नवाले का आयोजन नहीं किया जाता है। ब्राह्मण सभा के अध्यक्ष विनय शर्मा ने बताया कि इस पूजा का आयोजन समाज का हर वर्ग करवा सकता है। उन्होंने बताया कि केवल नौ व्यक्तियों को बुला कर और केवल अक्षत पुष्प, धूप, दीप और मक्की के दानों द्वारा पूजन कर इस अनुष्ठान को सफल बनाया जा सकता है। संध्या के समय अपने पारंपरिक वेश में जोगी आयोजक के घर पहुंच जाता है। इसके साथ ही मंडप सजाने की तैयारियां आरंभ होती हैं। इस दिन प्राय सभी नौ व्यक्तियों को उपवास रखना पड़ता है। साथ ही आयोजक सभी के चरणों को धुला कर उपयुक्त स्थान पर बिठाता है। एक पगड़ी और दान दक्षिणा टीका लगाने के साथ नवाला आरंभ होता है। कहा जाता है कि शिव अपना हार शृंगार कर आयोजन में आते हैं और चेले में शिव शक्ति का संचार होने लगता है। ऐंचली गायक और महिलाओं की ओर से गाए जाने वाले भजन व शिव के जयकारों में माहौल भक्तिमय हो जाता है। इस तरह से शिव पूजन प्रक्रिया पूरी होती है।
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