" कृपा करिए "
हे मनमोहन से गिरिधारी, थोड़ी हम पर भी कृपा करिए।
हम दास हैं जन्मों-जन्मों के, पीड़ा हिय की प्रभु अब हरिए।।
है रूह तलक घायल कान्हां, गम पहले से है पास बहुत।
हे नटवर नागर हे वनचारी, अब और ना गम हिस्से धरिए।।
महिमा अति भारी है तुम्हरी, तुम अग-जग सब संचालक हो।
शरणागत के प्रतिपालक प्रभु, हम दीनों के दिन भी फेरिए।।
तुम तोड़ प्रतिज्ञा भक्तों के हित, सुना हूं नग पग धाते हो।
क्यों अनसुन है अनुरोध अनिल, क्यों चुप हो प्रभु हमरी बेरिए।।
पंडित अनिल
अहमदनगर, महाराष्ट्र
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