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उद्बबोधन...

Anshu Mala

Mere Alfaz
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                            उद्बबोधन
        
                                                    
                            
कान पक गए सुनते-सुनते,
नारी का सम्मान करो।
पुरुष क्यों नहीं इस श्रेणी में?
इस का भी ध्यान करो।
नारी ही क्यों करें कर्त्तव्य का पालन?
नर क्यों हरदम अनजान रहे?
कहते सभी नारी स्वतंत्र है,
आधुनिकता की दौड़ में।
पूछती हूं मैं उन सबसे_
क्यों चीर हरण होता द्रोपदी का?
बेमेल व्यवस्था है कैसी यह?
कैसा है यह समाज तंत्र,
सब पहले जैसा ही यहां पर।
फिर ढोल पीटते क्यों लोग?
नारी को भोग्या मत समझो, नारी जग में महान।
नारी से नर होत है, धु्रव, प्रह्लाद समान।
मानव रूपी रथ जब चले समान
तब मानवता कहलाती महान।
अब देर मत करो मानवता का पर्व
मनाने में।
आओ नव निर्माण कार्य करें हम
उन दरिंदों का समूल नाश करें हम।
नवजागरण का विगुल बजाओ,
उद्बबोधन गीत अब गाओ।

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