जो अक्सर रंग बदलते हैं उसे गिरगिट सब कहते हैं
मगर इससे ना दूजा हम मनुज व्यवहार करते हैं
कभी कोई लोभ में आकर तो कभी स्वार्थ में पड़कर
मनुजता छोड़ पशुता को हम स्वीकार करते हैं
- आशुतोष अथर्व
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