काले घने अंधेरे बादल,
बरस बरस मुझे घेरे बादल,
शीतल ठंडी बहे हवा बयार,
मानस मन में उमड़े बस प्यार ,
हरियाली चादर धरती की,
हो गई हरी भरी रंग रंग के,
इन्द्रदेव पानी रंग लेकर,
अनवरत इसे बनाते जाये,
माँ धरती अपनी मिट्टी से,
जहाँ तहाँ अन्न उगाते जाये,
प्रकृति का ये खेल निराला,
हलक सुखे तो पानी का प्याला,
भूख लगे तो अन्न खालो,
वृक्ष की लकड़ी से इसे पकालो,
काले घने अंधेरे बादल,
कहे प्रेम की बाग लगालो,
मुझ पर रख विश्वास धरा पर,
ले लो परिणय फेरे,कहे बादल।
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