आज भागे जब बच्चे किसी अनजान घर की घंटी बजा के
कुछ बच्चे खुश थे और कुछ डर से गये थे
एक एहसास उस बूढ़ी माँ को भी हआ की शायद ये शैतान बच्चे है
पर वो भुलाना चाहती थी इन बातों को
रोक लेना चाहती थी इन सच्चाई भरे एहसासो को
और हो गयी वो खुश यह सोच कर के आगया शायद मेरा फौजी बेटा
आगया शायद मेरा फौजी बेटा जो आज तक घर नही लौटा है
आस में फिर इस उसने अपने हर जोर्डो के दर्द को भुला है
और भाग के दरवाजा खोलने की जल्दी मे आपना शॉल तक छोरा है
दरवाजा खोल के देखा तो आज भी नही था मेरा फौजी बेटा
बगल मे देखी तस्वीर और ज़हन मे फिर से यादें हो गयी
जो साल भर पहले आयी थी शहीद लाश उसकी भी अंगारे हो गयी।
-Akshat Mehrotra
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