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बचपन

hari om

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                            संदूक में बंद बचपन,
        
                                                    
                            
सिसकी ले रहा था
बाहर आने को,

एक बच्चा,
जो लेटा है धूल में
जो उछालता है उसी धूल को
जो सांस लेता है उसी धूल में।
जिसमें गिरा है पसीना
उसके पिता का।

दृश्य बदलता है,
बच्चा देखता है शून्य आसमान को
जहाँ से गिरती हैं बूंदे बरसात की
जो महकाती है धरती की महक को
जो भरती हैं खाली पड़े गड्ढों को,

जहाँ वही बच्चा छपछापता है
गढ्ढों में भरे पानी को
जो तैराता है अपनी कागज़ की कश्ती
जो घुमाता है साइकिल का पुराना पहिया
एक छोटी डंडी से
जो झूलता है आम की डार में

जो भीगता है निडर होकर
जिसे न आज की चिंता
न कल का डर

जो अनजान है इस लोकतंत्र से
क्योंकि उसने नहीं पढ़ी
अब्राहम लिंकन की परिभाषा

आज याद आता है
वो संतरे की टॉफी
वो कंचे का खेल
वो गुल्ली डंडा
और चोर सिपाही

आप जिंदा हैं
अगर जिंदा है
आपका बचपन
क्योंकि बचपन अवारा होता है।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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