व्यथा, मन की, गहरी है,
शब्दो के कंपन से चलकर ,
ये पहुंचती है, उन संवेदनाअों तक,
जो महसूस नहीं किये जा सकते,
केवल परतों के स्पृश से,
न मांगता है कुछ, न शोषित करता है,
करता है सघंर्ष. सिर्फ उन अर्थों से ,
जो खुद तो मरे है ही,
मदद भी करते हैं अस्तित्व मिटाने में,
किसे पता कि ये 'क्यूं' क्या है ?
ना ही ख्वाहिश है इसे जानने की ,
बस व्यवस्थित रखना चाहता है,
तन की भाव भगिंमाओ के साथ
मन की मुद्राओं के तिलिस्म को भी ,
परत दर परत बढ़ने की चाह में है,
फिर भी अधेंरे में खोते अस्तित्व को
रोशनी की झलक में कामायित देखता है
तो जानना चाहता है, एक बार फिर
कि क्या तलाश थी, कहां तक सीमित थी?
ध्रुवों की ठंडक थी या सूर्य की ऊष्मा सी.
- हरदीप सबरवाल
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