विज्ञापन

व्यथा

HS Sabharwal

Mere Alfaz
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            व्यथा, मन की, गहरी है,
        
                                                    
                            
शब्दो के कंपन से चलकर ,
ये पहुंचती है, उन संवेदनाअों तक,
जो महसूस नहीं किये जा सकते,
केवल परतों के स्पृश से,
न मांगता है कुछ, न शोषित करता है,
करता है सघंर्ष. सिर्फ उन अर्थों से ,
जो खुद तो मरे है ही,
मदद भी करते हैं अस्तित्व मिटाने में,
किसे पता कि ये 'क्यूं' क्या है ?
ना ही ख्वाहिश है इसे जानने की ,
बस व्यवस्थित रखना चाहता है,
तन की भाव भगिंमाओ के साथ
मन की मुद्राओं के तिलिस्म को भी ,
परत दर परत बढ़ने की चाह में है,
फिर भी अधेंरे में खोते अस्तित्व को
रोशनी की झलक में कामायित देखता है
तो जानना चाहता है, एक बार फिर
कि क्या तलाश थी, कहां तक सीमित थी?
ध्रुवों की ठंडक थी या सूर्य की ऊष्मा सी.

-  हरदीप सबरवाल

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Aalam-e-Ghazal Parvez

265 कविताएं

View Profile

Yunush khan

7864 कविताएं

View Profile

Anamika singer

344 कविताएं

View Profile