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अनुराग

krishna murari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अटकते हो कहीं पर तुम,
        
                                                    
                            
फटकते हो कहीं पर तुम,
बागवां की इस गली में,
चूम कर मंजुल कली के,
हाथ को,फिर हाथ में ले,
हाथ से करते इशारा।१।।

झूम कर बरसे झमाझम,
बिजलियां चमके चमाचम,
रात को उस नूर मे,
कोहिनूर सा दमके दमादम,
आह!कैसा रूप है ये,
लावण्य है ना शर्करा।२।।

चू रही टप-टप टपा-टप,
बूंद जुल्फी बादलों से,
मोतियों की लर न टूटे,
जुंबिश लबों से स्वर न फूटे,
इन्द्र धनुषी रंग मे,
काजलों के संग मे,
हुस्न की अंगड़ाइयां,
निर्मम बनीं तन्हाइयां,
खो गई रुसवाइयां,
मिल गया जो है किनारा।३।।

कृष्ण मुरारी पाण्डेय
रिसिया (बहराइच)।
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4 वर्ष पहले
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