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मातृभूमि

Love Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जय जग जननी जय हो तेरी
        
                                                    
                            
जाग उठी थी विभावरी,
इस मिट्टी के कण कण से
महक क्रांति की आ रही।

इस तन के रोओं पर लगती
तन मन भरती स्फूर्ति भाव से,
भर देती है इस अंतर्मन को
त्रिवेणी की उस घनी छांव से।

इस पर वर्ण लिखे थे कभी
पीपल की छाया में रुककर,
वीर भूमि की आभा लिए
लगती है कृषकों के तन पर।

सैनिक इसे मुट्ठी में लेकर
माथे पर फिर मल लेते हैं,
सरहदों की रक्षा कर के
इस मिट्टी में ढल लेते हैं।

चिड़िया के पंखों में फंसकर
मिट्टी के खिलौनों मे ढलती,
गोधूलि की पवित्र आभा ले
गायों के पैरों संग चलती।

मिट्टी का तन मिट्टी का मन
इस मिट्टी के राग है गाता,
चलता राही चल पड़ता है
अंत समय में फिर मिट्टी होता।

लव कुमार लव
नारायणगढ़ अम्बाला, हरियाणा
3 वर्ष पहले
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